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ऋष्यशृंग –

  • (१) महर्षि विभाण्डकके पुत्र । मृगीके पेटसे इनकी उत्पत्ति तथा ऋष्यशृंग नाम पड़नेका कारण (वन० १०५ । ३०- - ३२)।
  • ये कश्यपगोत्री थे और तपस्या तथा इन्द्रियसंयमसे ही प्रतिष्ठित हुए थे (शान्ति० २१६ । १४-१६)।
  • महर्षि ऋष्यशृंग ब्रह्मासभामें बैठकर ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं (सभा० ११ । २३)।
  • अपने आश्रमपर आयी हुई एक वेश्याको ब्रह्मचारी मुनि समझकर इनके द्वारा उसका आतिथ्य-सत्कार (वन० १११ । १३)।
  • वेश्याको ब्रह्मचारी समझकर इनके द्वारा अपने पितासे उसके स्वरूप और आचरणका वर्णन (वन० ११२ अ०में)।
  • इनका राजा लोमपादके यहाँ जाना (वन० ११२ । ८) लोमपादपुत्री शान्ताके साथ इनका विवाह (वन० ११३ । ११; शान्ति० २३४ । १८)।
  • महाभारतमें आये हुए ऋष्यशृंगके नाम -काश्यप, कश्यपपुत्र और कश्यपत्मज । (२) एक राक्षस, जिसके पुत्रका नाम अलम्बुषा या (द्रोण० १०६ । १६)।

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