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एकलव्य –

  • (१) निषादराज हिरण्यधनुका पुत्र । इसका द्रोणा-चार्यके पास धनुर्वेदके अध्ययनके लिये आगमन (आदि० १३१।३१)।
  • निषादपुत्र होनेके कारण द्रोणद्वारा इसका प्रत्याख्यान (आदि० १३१।३२)।
  • आचार्य द्रोणकी मूर्तिको गुरुभावना करके इसके द्वारा धनुर्विद्याका अभ्यास (आदि० १३१।३४)।
  • गुरुभक्तिके कारण इसकी बाणविद्यामें सफलता (आदि० १३१।३५)।
  • पाण्डवोंके कुत्तेके मुँहको बाणोंसे भरकर इसका पाण्डवोंको विस्मयमें डालना (आदि० १३१।३९)।
  • पाण्डवों तथा कौरवोंद्वारा इसकी प्रशंसा (आदि० १३१।४१)।
  • पाण्डवोंके प्रति इसका अपना परिचय देना (आदि० १३१। ४५)।
  • इसका द्रोणाचार्यको अपने दाहिने हाथका अँगूठा काटकर गुरुदक्षिणाके रूपमें देना (आदि० १३१। ५८)।
  • द्रोणाचार्यका अर्जुनके हितके लिये इसका अँगूठा कटवाना (द्रोण० १८१।१७)।
  • श्रीकृष्णका अर्जुनके प्रति उसके पराक्रमका तथा अपने द्वारा इसके वधके कारणका कथन (द्रोण० १८१। १८-२१)।
  • निषादराज एकलव्यके श्रीकृष्णद्वारा मारे जानेकी चर्चा (उद्योग० ४८।७७; मौसल० ६।११)।
  • (२) क्रोधवशंशक दैत्यके अंशसे उत्पन्न एक राजा (आदि० ६७।६३)।
  • पाण्डवोंकी ओरसे इन्हें रणनिमन्त्रण भेजा गया (उद्योग० ४८।९०)।

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