← अनुक्रमणिका

कंस

  • (१) मथुराके महाराज उग्रसेनका पुत्र (सभा० २२ । ३६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ) ।
  • इसके रूपमें कालनेमि दानव ही उत्पन्न हुआ था (आदि० ६७ । ६७) ।
  • जरासंधकी पुत्री उसकी पत्नी थी, जो इसे राजा बना देनेकी शर्तके साथ मिली थी । मन्त्रियोंद्वारा इसका राज्याभिषेक और इसका अपने पिताको कैद करके स्वयं राज्य भोगना । इसके द्वारा देवकीका वसुदेवजीके साथ विवाह । आकाशमें देवदूतकी वाणी सुनकर इसका देवकीको मार डालनेके लिये उद्यत होना । इसके द्वारा देवकीके छः शिशुओंका वध (सभा० २२ । ३६ के बाद दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ७२१) ।
  • कंसका वसुदेवपर कड़ा पहरा । इसके द्वारा वसुदेवकी लायी हुई गोप-कन्याको मारनेका प्रयत्न । इसके द्वारा ब्रजके गोपियोंका सताया जाना (पृष्ठ ७२२) ।
  • श्रीकृष्ण-बलभद्रद्वारा सुनामा और मुष्टिकके मारे जानेपर कंसके मनमें भयका आवेश तथा श्रीकृष्णद्वारा कंसका वध (सभा० ३८, पृष्ठ ८०१, कालम २) ।
  • कंसके ज्ञान और बल-पराक्रममें कार्तवीर्यके समान था । इसे समस्त राजाओंको उद्वेग होता था । उसके पास एक करोड़ पैदल सैनिक थे । आठ लाख रथी और उतने ही हाथीसवार थे । बत्तीस लाख घुड़सवारोंकी सेना थी (सभा० ३८, पृष्ठ ८०३) ।
  • सभामें विराजमान कंसका श्रीकृष्णके हाथसे मन्त्रियों और परिवारसहित वध (सभा० अध्याय ३८, दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ८०४, कालम १) ।
  • (२) एक असुर, जो श्रीकृष्णद्वारा मारा गया । यह उग्रसेनके पुत्र कंससे भिन्न था (सभा० ३८, पृष्ठ ८२५) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in