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कच

  • देवगुरु बृहस्पतिके ज्येष्ठ पुत्र । देवताओंके आग्रह करनेपर भी इनका स्वीकार न करना (आदि० ७७ । १) ।
  • देवताओंके आग्रह करनेपर संजीवनी विद्या सीखनेके लिये शुक्राचार्यके समीप जाना (आदि० ७६ । १२-१८) ।
  • शुक्राचार्यको अपना परिचय देकर एक सहस्र वर्षोंतक ब्रह्मचर्य पालनके लिये इनका उनमें अनुमति माँगना (आदि० ७६ । २०) ।
  • शुक्राचार्य द्वारा इनका स्वागत (आदि० ७६ । २१) ।
  • इनके द्वारा गुरुकुलमें शुक्राचार्य एवं आचार्यपुत्री देवयानीकी आराधना (आदि० ७६ । २२-२५) ।
  • इनकी देवयानी द्वारा एकान्त-परिचर्या (आदि० ७६ । २६) ।
  • इनके द्वारा गुरुकी गौओंकी सेवा (आदि० ७६ । २७) ।
  • दानवोंका इन्हें मारकर कुत्तोंके पेट फाड़कर प्रकट कर देना (आदि० ७६ । २८) ।
  • दानवोंका इन्हें पीसकर समुद्रके जलमें मिला देना (आदि० ७६ । २९) ।
  • देवयानीके पुनः चिन्तित होनेपर शुक्राचार्यके द्वारा इनका पुनः संजीवन (आदि० ७६ । ३२) ।
  • दानवोंका इन्हें जलाकर इनकी राखको मदिरामें मिला शुक्राचार्यको पिला देना (आदि० ७६ । ४३) ।
  • गुरुके पेटमें मृत संजीवनी-विद्या सीखकर इनका शुक्राचार्यको जीवित करना (आदि० ७६ । ५८-६२) ।
  • इनके द्वारा गुरुकी महिमा एवं उनके अनादरसे हानिका वर्णन (आदि० ७६ । ६३-६४) ।
  • देवयानीके आग्रह करनेपर भी इनका उसके साथ विवाह स्वीकार न करना (आदि० ७७ । ६-१५) ।
  • इनको देवयानीके द्वारा संजीवनी विद्या सिद्ध न होनेका शाप (आदि० ७७ । १६) ।
  • इनके द्वारा देवयानीको ब्राह्मण-जातीय पति न मिलनेका शाप (आदि० ७७ । १९) ।
  • स्वर्ग जानेपर इनको देवताओं-द्वारा वरदान (आदि० ७७ । २३) ।
  • इनसे संजीवनी-विद्या पढ़कर देवताओंका कृतार्थ होना (आदि० ७८ । १) ।
  • बाण-शय्यापर पड़े हुए भीष्मके पास ये भी गये थे (शान्ति० ४७ । ९; अनु० २६ । ८) ।

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