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कण्व

  • (१) कश्यपगोज्रीय प्राचीन महर्षि, जिनका आश्रम माल्नी नदीके तटपर था (आदि० ७० । २१-२८) ।
  • इनके आश्रमका वर्णन (आदि० ७०। २४-२९) ।
  • इन्हें मेधातिथिका पुत्र और पूर्व दिशार्मे रहनेवाला ऋषि कताया गया है (ज्ञान्ति० २०८ । २७; अनु० १५१ । ३१; अजु० १६७५। ३८) ।
  • इनके द्वारा शकुन्तलाका पालन-वोपण एवं नामकरण (आदि० ७२ । १३-१६) ।
  • शकुन्तलाके गान्धर्व विवाहका समर्थन (आभादि० ७३ । २६-२७) ।
  • इनका शकुन्तल्लके प्रति पातित्त्य धर्मका उपदेध एवं इसकी महिमाका वर्णन (आदि० ७४ । ९-१०) ।
  • शकुन्तछाकों पति पहुँचानेके लिये शिष्योंकी इनका आदेश (आदि० ७४ । १०-११) ।
  • इनके द्वारा ज़ियोंकों पिताके घरमें अधिक दिनोतक रहनेका निषेध (आदि० ७४ । ११)। आचाय॑ बनकर इनके द्वारा राजा भरतके “गोवितता नामक अश्वमेध यशका सम्पादन (आदि० ७७ । १३०)।
  • इनका दुर्योधनकों समझाते हुए. मातलिका उपाख्यान मुनाना (उद्योग० ९१७। १२ से १०५ ॥ श७ तक) ।
  • इन्हें भरतसे दक्षिणारूपमें जाम्बूनद सुवर्णके बने हुए एक हजार कमर प्राम हुए ये (ब्ओण० ६८॥ ११- १२) ।
  • (२) प्राचीन युगास्तरके एक प्रसिद्ध तपस्वी महामुनि। जिन्हें ब्रश्नाजीनी वर दिया था € अनु» १४१ में दाक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ५९१५) ।

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