← अनुक्रमणिका

कपोत

  • गरुड़की प्रमुख संतानोंमेंसे एक (उद्योग० १०१ । १३) ।
  • कपोती और बहेलियेकी कथा (शान्ति० १४३ अध्यायसे १४९ तक) ।
  • कपोतके द्वारा शरणागत अतिथिका सत्कार (शान्ति० १४३ । ४) ।
  • बहेलियेको उसके क्रूर-कर्मके कारण संग-सन्निधिमें भी त्याग दिया था (शान्ति० १४३ । १०-१४) ।
  • पक्षियोंके वधसे पत्नीसहित जीविका चलानेवाले उस बहेलियेको एक दिन आँधी-वर्षके कारण महान् कष्टकी प्राप्ति (शान्ति० १४३ । १८-२५) ।
  • सर्दीसे व्याकुल हुई एक कपोतीको उठाकर उसी वृक्षपर रहनेवाले कबूतरने दूसरोंको सताना न छोड़ा (शान्ति० १४३ । २९-३०) ।
  • बहेलियेका एक वृक्षके नीचे विश्राम (शान्ति० १४३ । ३८-३९) ।
  • उसी कबूतरने कबूतरीका गुणगान तथा अपनी प्यारी भार्या पतिव्रता स्त्रीकी प्रशंसा (शान्ति० १४४ । १-१०) ।
  • कबूतरीका कबूतरसे शरणागत व्याधकी सेवाके लिये प्रार्थना (शान्ति० १४५ अध्याय) ।
  • कबूतरके द्वारा अतिथिसत्कार और अपने शरीरका बहेलियेके लिये परित्याग (शान्ति० १४६ अध्याय) ।
  • बहेलियेका वैराग्य (शान्ति० १४७ अध्याय) ।
  • कबूतरीका विलाप, अग्निमें प्रवेश तथा उन दोनों कपोतदम्पतिको स्वर्गलोककी प्राप्ति (शान्ति० १४८ अध्याय) ।
  • बहेलियेका तपस्या तथा दावानलमें दग्ध होकर उसका स्वर्गलोकमें जाना । कपोतकी शरणागत-वत्सलता तथा कपोतीके पातिव्रत्यकी अनुकरणीयता । कपोत-कपोतीके इस प्रसंगको श्रवण करनेका फल (शान्ति० १४९ अध्याय) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in