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कर्ण

  • (१) कुन्तीके गर्भ और सूर्यके अंशसे कवच-कुण्डल-धारी महाबली कर्णकी उत्पत्ति (आदि० ६३ । ९८; आदि० ११० । १८) ।
  • पहले इसका 'वसुषेण' नाम था; परंतु जब इसने अपने कवच-कुण्डलोंको शरीरसे उधेड़कर इन्द्रको दे दिया, तबसे उसका नाम 'वैकर्तन' हो गया (आदि० १७४ । ४४) ।
  • कुन्तीके द्वारा इसका जलमें परित्याग (आदि० १७४ । १३७ । १३८) ।
  • इसे ब्राह्मणके लिये कुछ भी अदेय नहीं था (आदि० १७४ । १४३) ।
  • ब्राह्मण-रूपमें याचक होकर आये हुए इन्द्रको इसके द्वारा कवच-कुण्डलका दान एवं प्रसन्न हुए इन्द्रसे इसको 'शक्ति' नामक अमोघ अस्त्रकी प्राप्ति (आदि० १७४ । १४४—१४६; आदि० १७५ । २८—२९) ।
  • यह सूर्यदेवका सर्वोत्तम अंश था (आदि० १७५ । ५०) ।
  • राधिकाके प्रवाहमें बहते हुए इस बालक कर्णका अधिरथके हाथमें पहुँचना (आदि० १०० । २३) ।
  • अधिरथ तथा उसकी पत्नी राधाका इसको अपना पुत्र बना लेना (आदि० ११० । २३) ।
  • इसका 'वसुषेण' नाम होनेका कारण (आदि० ११० । २४) ।
  • इसको सूर्य-भक्ति (आदि० ११० । २५) ।
  • इसकी ब्राह्मण-भक्ति (आदि० ११० । २६) ।
  • इसका 'कर्ण' और 'वैकर्तन' नाम होनेका कारण (आदि० ११० । ३१) ।
  • द्रोणाचार्यके समीप अध्ययनके लिये इसका आगमन (आदि० १३१ । ११) ।
  • अध्ययनवस्थामें अर्जुनसे इसकी स्पर्धा (आदि० १३१ । १२) ।
  • रङ्गभूमिमें इसकी अर्जुनसे स्पर्धा तथा अस्त्र-कुशलता (आदि० १३५ । १—१२) ।
  • रङ्ग-भूमिमें दुर्योधनद्वारा इसका सम्मान (आदि० १३५ । १३—१४) ।
  • अर्जुनद्वारा इसे रङ्गभूमिमें फटकार (आदि० १३५ । १८) ।
  • अर्जुनसे लड़नेके लिये इसका रङ्गभूमिमें उद्यत होना (आदि० १३५ । २०) ।
  • रङ्गभूमिमें कृपाचार्यका इससे परिचय पूछना और इसका लज्जित होना (आदि० १३५ । ३४) ।
  • दुर्योधनद्वारा अङ्ग-देशके राजपदपर अभिषेक (आदि० १३५ । ३८) ।
  • इसके द्वारा दुर्योधनको अटल मित्रताका वरदान (आदि० १३५ । ४१) ।
  • इसका रङ्गभूमिमें अपने पिता अधिरथ-का अभिवादन (आदि० १३६ । २) ।
  • भीमसेनद्वारा इसका तिरस्कार (आदि० १३६ । ६) ।
  • द्रुपदसे पराजित होकर इसका पलायन (आदि० १६५ । २४ के बाद दाक्षिणात्य पाठ) ।
  • द्रौपदीके स्वयंवरमें इसका आगमन (आदि० १६५ । ४) ।
  • स्वयंवरमें लक्ष्यवेधके लिये उद्यत हुए कर्णको देखखर सूतपुत्र होनेके कारण इसका वरण न करनेके सम्बन्धमें द्रौपदीका वचन (आदि० १६६ । २३) ।
  • द्रौपदीके स्वयंवरमें अर्जुनद्वारा इसकी पराजय (आदि० १६८ । २) ।
  • पराक्रमपूर्वक द्रुपदको पराजित कर पाण्डवोंको कैद करनेके लिये इसका दुर्योधनको परामर्श (आदि० २०१ । १—२१) ।
  • इसको द्रोणकी फटकार (आदि० २०३ । २६) ।
  • राजसूय-दिग्विजयके समय भीमसेनद्वारा इसकी पराजय (सभा० ३० । २०) ।
  • युधिष्ठिरके राजसूय-यज्ञमें रथ-श्रेष्ठ कर्णका आगमन (सभा० ३४ । ७) ।
  • यह अङ्ग और वङ्ग देशका राजा था और इसने जरासंधको परास्त किया था (सभा० ४४ । १—११) ।
  • द्यूतके लिये आये हुए राजा युधिष्ठिर कर्णसे भी मिले थे (सभा० ५८ । २३) ।
  • द्यूतसभामें कर्ण भी उपस्थित था और द्रौपदीको दावपर लगानेसे बहुत प्रसन्न हुआ था (सभा० ६५ । ४४) ।
  • इसके द्वारा विकर्णको फटकारते हुए द्रौपदीके हारे जानेकी घोषणा और द्रौपदी तथा पाण्डवोंके वस्त्र उतार लेनेके लिये दुःशासनको आदेश (सभा० ६८ । २७—३८) ।
  • इसका द्रौपदीको दूसरा पति चुन लेनेके लिये कहना और उसे दासी बताना (सभा० ७१ । १—४) ।
  • वनमें चलकर पाण्डवोंका वध करनेके लिये दुर्योधनको इसकी सलाह (वन० ७ । १६—२०) ।
  • द्वैतवनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये इसका दुर्योधनको उभाड़ना (वन० २२७ अध्याय) ।
  • घोषयात्राका प्रस्ताव बताना (वन० २३८ । १९—२०) ।
  • धृतराष्ट्रके आगे घोषयात्राका प्रस्ताव रखना (वन० २३९ । ३—५) ।
  • द्वैतवनमें गन्धर्वोंद्वारा इसकी पराजय (वन० २४१ । ३२) ।
  • मार्गमें इसके द्वारा दुर्योधनका अभिनन्दन (वन० २४७ । १०—१५) ।
  • दुर्योधनको अनशन न करनेके लिये इसका समझाना (वन० २५० अध्याय) ।
  • भीष्मद्वारा इसकी निन्दा; इसके क्षोभपूर्ण वचन और इसका दिग्विजयके लिये प्रस्थान (वन० २५३ अध्याय) ।
  • इसके द्वारा समूची पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें इसका स्वागत (वन० २५४ अध्याय) ।
  • कर्णका दुर्योधनको यशके लिये सलाह देना (वन० २५५ अध्याय) ।
  • कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा (वन० २६० । १६—१७) ।
  • सूर्यके समझानेपर भी इसका कवच-कुण्डल देनेका ही निश्चय रखना (वन० ३०० । २७—३१) ।
  • इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कवच-कुण्डल देनेका निश्चय (वन० ३०१ । १७ के बाद दाक्षिणात्य पाठ) ।
  • कर्णका कुन्तीके गर्भसे जन्म; कुन्तीका उसे पिठारीमें रखकर अश्वनदीमें बहा देना तथा अमृतसे प्रकट हुए कवच-कुण्डल धारण करनेके कारण इसका नदीमें जीवित रह सकना (वन० ३०८ । ५—२०) ।
  • कर्णका अधिरथ और राधाके हाथमें आना (वन० ३०९ । ५—६) ।
  • राधाद्वारा कर्णका विधि-पूर्वक पालन (वन० ३०९ । ११—१२) ।
  • इसका 'वसुषेण' और 'वृष' नाम पड़नेका कारण (वन० ३०९ । १३—१४) ।
  • हस्तिनापुरमें इसकी शिक्षा और दुर्योधनसे मित्रता (वन० ३०९ । १०—१८) ।
  • इन्द्रसे उनकी शक्ति माँगना (वन० ३१० । २१) ।
  • इसको इसके द्वारा कवच-कुण्डल दान (वन० ३१० । ३८) ।
  • पाण्डवोंका पता लगानेके लिये इसकी पुनः गुप्तचर भेजनेकी सलाह (विराट० २६ । ८—१२) ।
  • द्रोणाचार्यकी बातोंपर आक्षेप करते हुए अर्जुनसे युद्ध करनेका ही इसका निश्चय (विराट० ४७ । २१—२४) ।
  • इसकी आत्मप्रशंसापूर्ण अहङ्कारोक्ति (विराट० ४८ अध्याय) ।
  • अर्जुनपर इसका आक्रमण (विराट० ५४ । १९) ।
  • अर्जुनसे पराजित होकर युद्धके मुहानेसे भागना (विराट० ५४ । ३६) ।
  • अर्जुनके साथ पुनः युद्ध और पराजित होकर भागना (विराट० ६० । २७) ।
  • कर्णके कपड़ों का उत्तरद्वारा उतारा जाना (विराट० ६५ । १५) ।
  • द्रुपदके पुरोहितके कथनका समर्थन करनेवाले भीष्मके वाक्योंपर इसका आक्षेप करना (उद्योग० २९ । ९—१५) ।
  • इसकी आत्मप्रशंसा (उद्योग० ३२ । २९—३३; उद्योग० ६२ । २—६) ।
  • भीष्मजीके आक्षेप करनेपर इसका अस्त्र त्यागकर सभासे प्रस्थान (उद्योग० ६२ । १३) ।
  • दुर्योधनके पक्षमें रहनेका निश्चय बताते हुए श्रीकृष्णसे रणयज्ञके रूपकका वर्णन करना (उद्योग० १५१ अध्याय) ।
  • इसके द्वारा श्रीकृष्णसे युधिष्ठिरकी विजय और दुर्योधनकी पराजयके लक्षणोंका वर्णन (उद्योग० १५३ । २—५५) ।
  • कुन्तीको उत्तर देते हुए उनके चार पुत्रोंको न मारनेकी प्रतिज्ञा (उद्योग० १५६ । ४—२३) ।
  • भीष्मजीके जीतेजी युद्ध न करने की प्रतिज्ञा (उद्योग० १५६ । २५—२९) ।
  • भीष्मकी कटु आलोचना (उद्योग० १५८ । ११—२९) ।
  • पाँच दिनमें ही पाण्डवसेनाको नष्ट करनेकी अपनी शक्तिका कथन (उद्योग० १६२ । २०) ।
  • श्रीकृष्णके समझाने पर दुर्योधनका ही पक्ष ग्रहण करनेका निश्चय (भीष्म० ५३ । १२) ।
  • भीष्मसे शस्त्र डलवा देनेके लिये दुर्योधन को सलाह देना (भीष्म० ९० । ७—१३) ।
  • बाणशय्यापर पड़े हुए भीष्मके पास जाकर इसका उन्हें प्रणाम करना (भीष्म० १२२ । ४—५) ।
  • भीष्मके समझानेपर क्षमायाचना करते हुए इसका युद्धका ही निश्चय बताना (भीष्म० १२२ । २३—३३) ।
  • कौरवोंद्वारा इसका स्मरण (द्रोण० १ । ३३—४०) ।
  • भीष्मके लिये शोक प्रकट करते हुए इसका रणके लिये प्रस्थान (द्रोण० २ अध्याय) ।
  • भीष्मकी प्रशंसा करते हुए युद्धके लिये उनसे आज्ञा माँगना (द्रोण० ३ अध्याय) ।
  • भीष्मकी आज्ञा पाकर कौरवोंकी सेनामें इसका जाना (द्रोण० ५ । १५) ।
  • दुर्योधनके पूछनेपर इसका सेनापतिके लिये द्रोणाचार्यका नाम बताना (द्रोण० ५ । १३—२२) ।
  • द्रोणाचार्यसे भीमसेनके स्वभावका वर्णन करते हुए द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये कहना (द्रोण० २२ । १८—२८) ।
  • केकय- राजकुमारोंके साथ युद्ध (द्रोण० २५ । ४२—४४) ।
  • अर्जुन, भीमसेन, धृष्टद्युम्न और सात्यकिके साथ युद्ध (द्रोण० ३२ । ५२—५७) ।
  • इसका अभिमन्युसे पराजित होना (द्रोण० ४० । १७—३६) ।
  • इसका द्रोणाचार्यसे अभिमन्युके वधका उपाय पूछना (द्रोण० ४८ । १८) ।
  • इसके द्वारा अभिमन्युके धनुष और ढाल का काटा जाना (द्रोण० ४८ । ३२—३९) ।
  • इसके ध्वजका वर्णन (द्रोण० १०५ । १२—१४) ।
  • भीमसेनके साथ युद्धमें इसका पराजित होना (द्रोण० १२९ । ३३) ।
  • भीमसेनके साथ इसका युद्ध और पराजित होना (द्रोण० १२९ से १३८ अध्यायतक) ।
  • भीमसेनसे बचनेके लिये इसका रथमें दुबक जाना (द्रोण० १२९ । ७६) ।
  • भीमसेनको मूर्च्छित करके इसका धनुषकी नोकसे उन्हें दबाना (द्रोण० १३१ । ११—१२) ।
  • भीमसेनको कटुवचन सुनाना (द्रोण० १३१ । ९५—१०१) ।
  • अर्जुनके बाणोंसे आहत होकर इसका दूर हट जाना (द्रोण० १३९ । ११४) ।
  • अर्जुनके द्वारा युद्धमें परास्त होना (द्रोण० १४५ । ८३—८४) ।
  • दुर्योधनके प्रोत्साहन देनेपर उसे उत्तर देना (द्रोण० १४५ । २५—३३) ।
  • सात्यकिके साथ युद्धमें इसकी पराजय (द्रोण० १४७ । ६६—६५) ।
  • दुर्योधनद्वारा द्रोणाचार्यपर किये गये दोषारोपणका निराकरण (द्रोण० १५२ । १९—२२) ।
  • दुर्योधनसे देवकी प्रधानताका वर्णन (द्रोण० १५२ । २३—३४) ।
  • दुर्योधनको आश्वासन (द्रोण० १५८ । ७—११) ।
  • इसके द्वारा कृपाचार्यका अपमान (द्रोण० १५८ । ४५—५०) ।
  • अर्जुनके साथ युद्धमें इसका पराजित होना (द्रोण० १५९ । ६२—६४) ।
  • सहदेवको युद्धमें परास्त करके उनके शरीरमें धनुषकी नोक चुभोकर उन्हें कटुवचन सुनाना (द्रोण० १६० । २—१८) ।
  • सात्यकिके साथ इसका युद्ध (द्रोण० १७० । ३०—४३) ।
  • दुर्योधनको इसकी सलाह (द्रोण० १७० । ४६—५०) ।
  • इसके द्वारा धृष्टद्युम्नकी पराजय (द्रोण० १७३ । ५) ।
  • घटोत्कचके साथ इसका घोर युद्ध (द्रोण० १७५ अध्याय) ।
  • इसके द्वारा इन्द्रकी दी हुई शक्तिसे घटोत्कचका वध (द्रोण० १७९ । ४४—४८) ।
  • भीमसेनके साथ युद्ध और उन्हें परास्त करना (द्रोण० १८८ । १०—२२) ।
  • भीमसेनके साथ युद्ध (द्रोण० १८९ । १०—५३) ।
  • द्रोणाचार्यके मारे जानेपर युद्धस्थलसे भागना (द्रोण० १९३ । १०) ।
  • सात्यकिद्वारा इसकी पराजय (द्रोण० २०१ । ५३) ।
  • संजयद्वारा इसके सेनापतित्व तथा मृत्युका वर्णन (कर्ण० ३ । १७—२१) ।
  • अर्जुनद्वारा इसके पुत्र वृषसेनके वधकी चर्चा (कर्ण० ५ । २३-२४) ।
  • सेनापतिके लिये प्रस्ताव करनेपर दुर्योधनको आश्वासन (कर्ण० १० । ४०-४१) ।
  • सेनापति-पदपर अभिषेक (कर्ण० १० । ४३) ।
  • इसका कौरव सेनाका मकरव्यूह बनाकर युद्धके लिये प्रस्थान (कर्ण० १७ । १४) ।
  • इसके द्वारा पाण्डवसेनाका संहार (कर्ण० २१ । १८-२४) ।
  • भागते हुए नकुलके गलेमें धनुष फँसाकर उन्हें पकड़ना और जीवित छोड़ देना (कर्ण० २४ । ४५-५१) ।
  • सात्यकिके साथ इसका युद्ध (कर्ण० ३० अध्याय) ।
  • दुर्योधनसे अपनी युद्धसम्बन्धी व्यवस्थाके लिये कहना (कर्ण० ३१ । ३५-६१) ।
  • शल्यको सारथि बनाकर युद्धके लिये प्रस्थान (कर्ण० ३३ । २४-२५) ।
  • इसकी आत्मप्रशंसा (कर्ण० ३७ । १३-३१) ।
  • अर्जुनका पता बतानेवालेको पुरस्कार देनेकी घोषणा (कर्ण० ३८ अध्याय) ।
  • शल्यको फटकारते हुए मद्रनिवासियोंकी निन्दा करना और उन्हें मारनेकी धमकी देना (कर्ण० ४० अध्याय) ।
  • शल्यको फटकारते हुए अपनेको परशुरामजी तथा एक ब्राह्मणद्वारा प्राप्त शापोंकी बात बताना (कर्ण० ४२ अध्याय) ।
  • आत्मप्रशंसापूर्वक शल्यको फटकारना (कर्ण० ४३ अध्याय) ।
  • इसके द्वारा मद्र आदि बाह्रीक देशवासियोंकी निन्दा करना (कर्ण० ४४ से ४५ अध्यायतक) ।
  • पाण्डव-सेनाका संहार (कर्ण० ४६ । २१-२२) ।
  • कर्णपुत्र सुषेण और चित्रसेन- द्वारा इसकी रक्षा, वृषसेनद्वारा उसके पृष्ठभागकी रक्षा (कर्ण० ४८ । १८-१९) ।
  • भीमसेन- द्वारा कर्णपुत्र भानुसेनका वध (कर्ण० ४८ । २७) ।
  • कर्णद्वारा युधिष्ठिरपर आक्रमण (कर्ण० ४८ । ६३) ।
  • युधिष्ठिरके साथ युद्धमें इसका मूर्च्छित होना (कर्ण० ४९ । २७) ।
  • इसके द्वारा युधिष्ठिरके चक्ररक्षक चन्द्रदेव और दण्डधारका वध (कर्ण० ४९ । २७) ।
  • युधिष्ठिरको परास्त करके उनका तिरस्कार करना (कर्ण० ४९ । ४८-५९) ।
  • भीमसेनद्वारा इसकी पराजय (कर्ण० ५० । ४७) ।
  • भीमसेनके साथ इसका घोर संग्राम (कर्ण० ५१ से अध्यायतक) ।
  • इसके द्वारा पाञ्चाल, चेदि और केकय-वीरोंका भीषण संहार (कर्ण० ५६ । ३८-६१) ।
  • धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध (कर्ण० ५७ । १०-१४) ।
  • इसके द्वारा शिखण्डीकी पराजय (कर्ण० ६१ । २३) ।
  • युधिष्ठिरको घायल करके युद्धसे विमुख कर देना (कर्ण० ६२ । २९-३१) ।
  • इसके द्वारा नकुल, सहदेव और युधिष्ठिरकी भीषण पराजय (कर्ण० ६३ अध्याय) ।
  • दुर्योधनकी प्रेरणासे इसका भार्गवका प्रकट करना (कर्ण० ६४ । ४७) ।
  • उत्त मौजाद्वारा कर्णपुत्र सुषेणका वध (कर्ण० ७५ । ७) ।
  • इसके द्वारा पाण्डवसेनाका भीषण संहार (कर्ण० ७८ अध्याय) ।
  • अर्जुनके पराक्रमके विषयमें शल्यसे वार्तालाप (कर्ण० ७९ । ४९-७०) ।
  • अर्जुन और भीमसेनद्वारा खडे़ हुए धृतराष्ट्र-पुत्रोंको इसका शरण देना (कर्ण० ८१ । ५१) ।
  • इसके द्वारा केकयराजकुमार विशोकका वध (कर्ण० ८२ । ३) ।
  • केकय-सेनापति उपकर्मका वध (कर्ण० ८२ । ५) ।
  • सात्यकिद्वारा कर्णपुत्र प्रसेनका वध (कर्ण० ८२ । ६) ।
  • इसके द्वारा धृष्टद्युम्नके पुत्रका वध (कर्ण० ८२ । ९) ।
  • इसका भीमसेनके भयसे भीत होना (कर्ण० ८४ । ७-८) ।
  • अर्जुनद्वारा कर्णपुत्र वृषसेनका वध (कर्ण० ८५ । ३६) ।
  • शल्यसे वार्तालाप (कर्ण० ८७ । १०१-१०३) ।
  • अर्जुन- के साथ द्वंद्व युद्ध (कर्ण० ८९ अध्याय) ।
  • कर्णके सर्पमुख बाणसे अर्जुनके किरीटका गिरना (कर्ण० ९० । २२) ।
  • रथका पहिया धँस जानेसे उसे निकालनेके लिये इसका रथसे उतरना और बाण न चलानेके लिये अर्जुन- से अनुरोध करना (कर्ण० ९० । १०५-११६) ।
  • अर्जुनद्वारा इसका वध (कर्ण० ९१ । ५०) ।
  • कर्णका दाह-संस्कार (कर्ण० ९६ । ३३) ।
  • ब्राह्मणद्वारा इसे शाप प्राप्त होना (शान्ति० २ । २३-२६) ।
  • इस ब्रह्मशापकी प्राप्ति और परशुरामजीका शाप (शान्ति० ३ अध्याय) ।
  • कलिङ्गराजकी कन्याका दुर्योधनद्वारा अपहरण होनेपर इसके द्वारा समस्त राजाओंकी पराजय (शान्ति० ४ । १७-२०) ।
  • इसके बल-पराक्रमका वर्णन (कर्ण० ५ अध्याय) ।
  • इसके द्वारा जरासंधकी पराजय (कर्ण० ५ । ४४) ।
  • इसके द्वारा मालिनी और चम्पानगरीकी प्राप्ति (कर्ण० ५ । ६-७) ।
  • इसके कुण्डलदानकी चर्चा (अनु० १३० । ९) ।
  • कुन्तीका व्यासजीके सम्मुख कर्णके जन्मप्रसङ्गकी चर्चा और इसे देखनेकी इच्छा व्यक्त करना (आश्रम० ३० अध्याय) ।
  • कर्ण सूर्यका अंश था (आश्रम० ३१ । १४) ।
  • व्यासजीके आवाहन करनेपर कर्णका भी प्रकट होना (आश्रम० ३६ । ९) ।
  • स्वर्गमें जाकर इसका सूर्यदेवमें मिल जाना (स्वर्ग० ५ । २०) ।
  • (२) धृतराष्ट्रका एक पुत्र (आदि० ११६ । ३; आदि० ११६ । ४) ।
  • भीमसेनद्वारा इसपर आक्रमण (भीष्म० ७७ । ८) ।
  • भीमसेनद्वारा इसका वध (भीष्म० ७७ । १६) ।

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