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अणीमाण्डव्य -

  • महर्षि माण्डव्य तथा इनकी तपस्या ( आदि० १०६ । २ – ३ )।
  • इनका 'अणीमाण्डव्य' नाम होनेका कारण ( आदि० १०० । ८ )।
  • निरपराध होनेपर भी इनको शूलीपर चढ़ाये जानेका दण्ड मिला ( आदि० ६३ । १२ तथा आदि० १०६ । १२ )।
  • शूल के अग्रभागपर इनकी तपस्या ( आदि० १०६ । १५ )।
  • इनकी दयनीय दशामें संतप्त एवं तपस्यासे प्रभावित हो पक्षीरूपधारी महर्षियोंका इनके समीप आगमन ( आदि० १०६ । १६ )।
  • फर्तिंगोंके पुच्छभागमें सींक घुसेड़नेके फलस्वरुप ही आपको शूलीपर चढ़ाये जानेका दण्ड मिला है-इस प्रकार धर्मराजद्वारा इनको सम्बोधन ( आदि० १०० । ११ )।
  • ब्राह्मणत्वकी अत्यधिक भर्त्सना इनके द्वारा प्रतिपादन ( आदि० १०० । १५ )।
  • ( संसारके ) शुद्रयोनिके जन्मलेनेका इनके द्वारा अभिशाप ( आदि० १०० । १६ ; ६३ । १६ )।
  • 'चौदह वर्षोंकी आयुक्त किये हुए अशुभ कर्मोका फल किसीको नहीं प्राप्त होगा' इस प्रकार इनकी घोषणा ( आदि० १०० । १७ )।
  • श्रीकृष्णके हस्तिनापुर जाते समय मार्गमें उनसे जो ऋषि मिले थे, उनमें अणीमाण्डव्य भी थे ( देखिये उद्योग० ८३ । ६४ के बाद दक्षिणात्य पाठ )।
  • इनका विदुरराज जनकसे तृष्णाका त्याग करनेके विषयमें प्रश्न करना ( शान्ति० २७६ । १३ )।
  • शिव महिमाके विषयमें युधिष्ठिरको अपना अनुभव बताना ( अनु० १८ । ४६-५३ )।

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