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कलाप

  • एक महातेजस्वी ऋषि, जिनका राजसूय यज्ञके अन्तमें राजा युधिष्ठिरने पूजन किया (सभा० ४५ । ३८ के बाद दाक्षिणात्यपाठ पृष्ठ ८४३, कालम १) ।
  • (१) सोलह देवगन्धर्वोंमेंसे एक । कश्यप-पत्नी 'मुनि' के पुत्र (आदि० ६५ । ४४) ।
  • ये अर्जुनके जन्म-महोत्सवमें भी पधारे थे (आदि० १२२ । ५७) ।
  • (२) सत्ययुग आदिके क्रमसे प्रवृत्त होनेवाला चौथा युग (शान्ति० ६९ । ८१-८२) ।
  • इसका इन्द्रके साथ संवाद—दमयन्तीने राजा नलको अपना पति चुन लिया—यह इन्द्रसे सुनकर इसका कुपित होना और उसे दण्ड देनेको उद्यत हो जाना (वन० ५८ । ६) ।
  • नलके शरीरमें प्रविष्ट होकर उन्हें राज्यसे वञ्चित करनेका संकल्प करना और इसमें इसकी द्वापरसे सहायताके लिये प्रार्थना (वन० ५८ । १३-१४) ।
  • इसका राजा नलके शरीरमें प्रवेश (वन० ५९ । ३) ।
  • पुष्करको जुआ खेलनेके लिये तैयार करना (वन० ५९ । ४-५) ।
  • नलको दुःख देनेवाले (कलियुग) के लिये दमयन्तीका शाप (वन० ६३ । १६-१७) ।
  • कर्कोटक नागके विषसे दग्ध हो कलियुगका बड़े दुःखसे नलके शरीरमें रहना (वन० ६३ । १५-१६) ।
  • द्यूतक्रियाका रहस्य जाननेके अनन्तर नलके शरीरसे कलियुगका निकलना और शापनिर्मुक्त होना (वन० ७२ । ३०-३१) ।
  • कलिका अपने स्वरूपको प्रकट करना और नलका उसे शाप देनेका विचार करना (वन० ७२ । ३२) ।
  • भयभीत एवं कम्पित हुए कलियुगका हाथ जोड़कर राजासे क्रोध रोकनेकी प्रार्थना करना, इन्द्रसेनजननी दमयन्तीके शापसे अपने पीड़ित होनेकी चर्चा करना, नलकी शरणमें जाना और नलका कीर्तन करनेवालोंको अपनेसे (कलिसे) भय न होनेकी घोषणा करना और डरकर वहेड़ेके वृक्षमें समा जाना (वन० ७२ । ३०-३८) ।
  • कलियुगका सर्वश्रेष्ठ तीर्थ गङ्गा (वन० ८५ । ८९-९१) ।
  • कलियुगका मान (वन० १८८ । २६-२७) ।
  • कलियुगके अन्तिम भागमें संसारकी स्थिति (वन० १८८ । ३९-४४) ।
  • कलियुग एवं युगान्तमें जगत्की परिस्थिति (वन० १९० । ११-८८) ।
  • कलिके मनुष्योंकी आयु (शान्ति० २३१ । २५) ।
  • कलिके युगधर्मका वर्णन (वन० १४३ । ३२-३८; शान्ति० २६९ । ४१-४७; शान्ति० २३१, २३२, २३८ और ३४० अध्यायोंमें भी कलिधर्मका वर्णन आया है) ।
  • मार्कण्डेयजीद्वारा उसके प्रभावका वर्णन (वन० १८८ । २९-८५; वन० १९० । ७-९२) ।
  • इस कलियुग का अंश ही कुरुकुलकलङ्क राजा दुर्योधनके रूपसे उत्पन्न हुआ था (आदि० ६७ । ८७; आश्रम० ३१ । १०) ।
  • (३) भगवान् सूर्यका एक नाम (वन० ३ । २०) ।
  • (४) भगवान् शिवका एक नाम (अनु० १७ । ७९) ।

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