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कलिङ्ग (कालिङ्ग)

  • (१) दक्षिण भारतका एक प्राचीन देश । तीर्थयात्राके अवसरपर यहाँ अर्जुनका आगमन (आदि० २१४ । ९; भीष्म० ९ । ४६, ६९) ।
  • सहदेवने दक्षिण-विजयके समय इसे जीता था (सभा० ३१ । ७१) ।
  • इस देशके निवासी युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें भेंट लेकर आये थे (सभा० ५२ । १८) ।
  • तीर्थयात्राके समय युधिष्ठिर यहाँ गये थे (वन० ११४ । ४) ।
  • कर्णने दिग्विजयके समय इसे जीता था (वन० २५४ । ८) ।
  • सहदेवने दन्तपूरमें कलिङ्गोंको परास्त किया था (उद्योग० २३ । २४) ।
  • दन्तपूरमें कलिङ्गोंके निवासकी चर्चा भी है (उद्योग० ४८ । ७६) ।
  • सहदेवने इसे जीता था—इसकी चर्चा (उद्योग० ५० । ३९) ।
  • कर्णने इस देशको पहले जीता था (द्रोण० ४ । ८) ।
  • द्रोणनिर्मित गरुडव्यूहकी ग्रीवा और पीठके स्थानपर कलिङ्गदेशीय योद्धा स्थित थे (द्रोण० २० । ६-१०) ।
  • परशुरामजीके द्वारा इस देशके निवासी परास्त हुए थे (द्रोण० १४१ । १०) ।
  • कलिङ्गदेशीय योद्धा सात्यकिके साथ लड़े थे (द्रोण० १४३ । १०-११) ।
  • परशुरामजीके डरसे भगे हुए कुछ क्षत्रिय शूद्र हो गये थे—उन्हींमें कलिङ्गोंकी भी गणना है (अनु० ३३ । २२) ।
  • (२) कलिङ्ग देशका राजा (सभा० ५२ । ७ के बाद दा० पाठ) ।
  • इसका नाम श्रुतायु था (भीष्म० ५४ । ६८-६९) ।
  • यह द्रौपदीके स्वयंवरमें गया था (आदि० १८४ । १३) ।
  • द्रोणनिर्मित व्यूहके दाहिने अङ्गमें स्थित था (द्रोण० ७ । ११) ।
  • जयद्रथ की रक्षा में संलग्न था (द्रोण० ७४ । १७) ।
  • भीमसेन ने कलिङ्गराज श्रुतायुको युद्ध और उनके द्वारा इसका वध (द्रोण० १५३ । २१-२४) ।
  • कलिङ्गराज श्रुतायुको आये करके कलिङ्गवासियोंने भीमसे लड़ाई की और उनके द्वारा वे मारे गये थे (भीष्म० ५४ । १३-४२) ।
  • (शेष देखिये श्रुतायु—) ।
  • (२) स्कन्दका एक सैनिक (शल्य० ४५ । ४४) ।

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