← अनुक्रमणिका

कवची

  • धृतराष्ट्रका पुत्र (आदि० ६७ । १०२) ।
  • भीमसेनद्वारा इसका वध (कर्ण० ८४ । २-६) ।
  • (१) महर्षि भृगुके पुत्र (आदि० ६६ । ४२) ।
  • अगस्त्यजीके कमलोंकी चोरी होनेपर शपथ करना (अनु० ९४ । ३२) ।
  • (२) वृहस्पतिके पाँचवें पुत्र एक अग्नि; जो वड़वानलरूपसे समुद्रका जल सोखते हैं । शरीरके भीतर ऊपरकी ओर गतिशील होनेके कारण इन्हें 'उदान' और 'ऊर्ध्वभाक्' भी कहा गया है (वन० २१६ । २०) ।
  • (३) वरुणके यज्ञमें ब्रह्माजीके शुक्रका हवन होनेसे जो तीन पुरुष प्रकट हुए, उनमेंसे एक । शेष दो भृगु और अङ्गिरा थे । ब्रह्माजीने कविको ही अपना पुत्र स्वीकार किया । इस कविने 'कवि, काव्य' आदि आठ पुत्र हुए जो वारुण कहलाते हैं । ये सभी प्रजापति हैं (अनु० ८५ । १२२-१२४) ।
  • (४) ब्रह्मपुत्र कवि के पुत्र (अनु० ८५ । १२३) ।
  • (५) एक विश्वेदेव (अनु० ९१ । १६) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in