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कश्यप

  • (१) एक देवर्षि, ब्रह्मर्षि और प्रजापति; जो मरीचि ऋषिके पुत्र और दक्ष प्रजापतिके जामाता हैं (आदि० ६५ । ११) ।
  • ये कद्रू और विनताके पति हैं (आदि० १६ । ६) ।
  • ब्रह्माजीने इन्हें सर्पोंपर क्रोध न करनेके लिये कहा और उनका विष उतारनेवाली विद्या प्रदान की (आदि० २० । १५-१६) ।
  • कश्यपका गरुड़से कुशल पूछना और उनके भोजन माँगनेपर एक हाथी और कछुएको खानेके लिये आदेश देना । विभावसु और सुप्रतीक मुनिके वैर और शापकी कथा सुनाकर उन्हींके हाथी और कछुआ होनेकी बात बताना और उनके विशाल शरीर एवं युद्धका वर्णन करना (आदि० २६ । १३-३२) ।
  • तपस्यामें लगे हुए पिता कश्यपका गरुड़को दर्शन (आदि० ३० । ११) ।
  • इनका पुत्रकी कामनासे यज्ञ करना (आदि० ३१ । ५) ।
  • वालखिल्यों-के प्रसादसे इनका विनताके गर्भसे अरुण और गरुड़को जन्म देकर गरुड़को पक्षियोंके 'इन्द्र' पदपर अभिषिक्त करना (आदि० ३१ । १२-१५) ।
  • अदिति, दिति, दनु, काला, दनायु, सिंहिका, क्रोधा, प्राधा, विश्वा, विनता, कपिला, मुनि, कद्रू—ये दक्षकी तेरह कन्याएँ इनकी पत्नियाँ हैं (आदि० ६५ । १२) ।
  • इनकी संतानोंका वर्णन (आदि० ६५ । १४-५४) ।
  • इनसे देवता और असुर दोनों उत्पन्न हुए (आदि० ६६ । ३४) ।
  • इन्होंने ज्येष्ठ पत्नी अदितिके गर्भसे इन्द्र आदि बारह आदित्योंको जन्म दिया (आदि० ७५ । १०) ।
  • कश्यप और सुरभिके सहवाससे नन्दिनी नामक गौकी उत्पत्ति (आदि० ९१ । ८-१४) ।
  • अर्जुनके जन्म-समयमें उपस्थित हुए सात ऋषियोंमें ये भी थे (आदि० १२२ । ५१) ।
  • परशुरामजीका इन्हें समूची पृथ्वी दानमें देना (आदि० १२९ । ६२) ।
  • ये ब्रह्माजीकी सभामें विराज- मान होते हैं (सभा० ११ । १५) ।
  • इनका प्रह्लादके पूछनेपर उन्हें प्रश्नका असत्य उत्तर देने या यथार्थ बात जानते हुए भी कुछ उत्तर न देनेके दोष बताना तथा दोनों पक्षोंसे मिले होनेके कारण गवाही न देनेवाले गवाहको प्राप्त हुए दोषका वर्णन करना (सभा० ६८ । ७३-७५) ।
  • युधिष्ठिरके साथ तीर्थयात्रा करनेवाले ऋषियोंमें इनका भी नाम आया है (वन० ८५ । ११३) ।
  • ब्रह्माजीने यज्ञमें सारी पृथ्वी कश्यपको दान कर दी; इससे पृथ्वीको बड़ा खेद हुआ और वह रसातलको जाने लगी । तब कश्यपजीने अपनी तपस्यासे पृथ्वीको प्रसन्न किया (वन० ११४ । १८-२२) ।
  • परशुराम- जीका कश्यपको भूमिदान करके स्वयं उनका महेन्द्रपर्वत- पर निवास (वन० ११७ । १४) ।
  • कश्यपपत्नी अदितिके गर्भसे भगवान्का वामन अवतार (वन० २७२ । ६२) ।
  • परशुरामजीसे सम्पूर्ण पृथ्वीको दक्षिणा- रूपमें लेकर उन्हें पृथ्वीसे बाहर निकल जानेका आदेश देना (द्रोण० ७० । १९-२१) ।
  • इनका द्रोणाचार्यके पास जाकर उनसे युद्ध बंद करनेको कहना (द्रोण० १९० । ३५-४०) ।
  • स्कन्दके जन्म-समयमें इनका आगमन (शल्य० ४५ । १०) ।
  • परशुरामजीसे दक्षिणा- रूपमें पृथ्वीका दान लेना (द्रोण० ७१ । ६४) ।
  • परशुरामजीको राज्यके बाहर भेजना (शान्ति० ४९ । ६५-६६) ।
  • रसातलको जाती हुई पृथ्वीको ऊरुओंके सहारे रोकना (शान्ति० ४९ । ७२) ।
  • पुरोहितके विषयमें पुरुखाको उपदेश (शान्ति० ७३ । ७-३२) ।
  • कश्यपजीका दूसरा नाम 'अरिष्टनेमि' भी है (शान्ति० २०८ । ८) ।
  • इनका भीष्मको वराह-अवतारकी कथा सुनाना (शान्ति० २०९ । ६) ।
  • ये मूलभूत कश्यप- गोत्रके प्रवर्तक हैं (शान्ति० २९६ । १०-१८) ।
  • महर्षि कश्यपके अङ्गोंसे तिलकी उत्पत्ति (अनु० १३ । १०) ।
  • इनका वृषादर्भिसे प्रतिग्रहका दोष बताना (अनु० १३ । ४०) ।
  • अगस्त्यसे अपने शरीरकी दुर्बलताका कारण बताना (अनु० १३ । ६५) ।
  • यातु- धानसे अपने नामका परिचय देना (अनु० १३ । ८६) ।
  • मृणालकी चोरीके विषयमें शपथ खाना (अनु० १३ । ११६-११७) ।
  • अगस्त्यके कहनेसे चोरी होनेपर शपथ खाना (अनु० ९४ । १८) ।
  • कुबेरके सात गुरुओंमेंसे एक ये भी हैं, ये उत्तर दिशाका आश्रय लेकर रहते हैं, इनके कीर्तनसे कीर्ति और कल्याणकी प्राप्ति होती है (अनु० १५० । ३८-३९) ।
  • इनका तपोबलसे पृथ्वीको धारण करना (अनु० १५३ । २) ।

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