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अत्रि –

  • एक ब्रह्मर्षि, जो ब्रह्माजीके मानस पुत्र थे ( आदि० ६५ । १० तथा शान्ति० के १६६, २०७, २०८ अध्याय )।
  • ये ब्रह्माजीके सात पुत्रों एवं सात ब्रह्माओंमेंसे एक हैं । इनके वंशमें प्राचीनबर्हि उत्पन्न हुए थे, जो दस प्रचेताओंके पिता थे । अत्रि के औरस पुत्र कहे गये हैं-नीरयवान् राजा सोम और भगवान् अर्यमा ( शान्ति० २०८ । ३-१० )।
  • ये इक्कीस प्रजापतियों में से एक हैं ( शान्ति० ३३४ । २५ )।
  • 'चित्रशिखण्डी' कहे जानेवाले सात ऋषियों में से भी एक हैं ( शान्ति० ३३५ । २७ )।
  • संपूर्ण लोकों की उत्पत्ति और प्रतिष्ठाके आधारभूत 'आठ प्रकृति' कहे जानेवाले मरीचि आदि प्रजापतियोंमें भी इनकी गणना की गयी है ( शान्ति० ३४० । ३४-३६ )।
  • इनकी पत्नीका नाम अनसूया था (अनु० १४।१५)।
  • पराशरका राक्षस-वृन्द बंद करानेके लिये इनका आगमन (आदि० १८०।८)।
  • महाराज पृथुके यज्ञमें इनका गौतमसे संवाद (वन० १८५।१९-२३)।
  • पृथुद्वारा इन्हें धनकी प्राप्ति (वन० १८५।३४-३६)।
  • अत्रिके शरीरसे विभिन्न अग्नियोंका प्रादुर्भाव (वन० २२२।२०-२१)।
  • द्रोणाचार्यके पास आकर उनसे युद्ध बंद करनेको कहना (द्रोण० १९०।३५-४०)।
  • इन्होंने सोमके राजसूय यज्ञमें होताका कार्य किया था (शल्य० ४३।४०)।
  • ये देवताओंकी प्रार्थनासे दिनमें सूर्य होकर तपे और रातमें चन्द्रमा बनकर प्रकाशित हुए। इनके तेजसे असुर दग्ध हो गये। इन्होंने सूर्यको तेजस्वी बनाया (अनु० १५६।९-१४)।
  • उत्तर दिशाका आश्रय लेकर उन्नति करनेवाले महर्षियोंमें इनका नाम आया है (अनु० १६५।४४)।
  • इनके धर्मात्मा पुत्र दुर्वासा पश्चिम दिशामें रहकर अभ्युदयशील होते हैं (अनु० १६५।४३)।
  • इन्होंने अपने वंशज निमिको श्राद्धके विषयमें उपदेश दिया था (अनु० १९।२०-४४)।
  • वृद्धादिसे प्रतिग्रहके दोष बताना (अनु० ९३।४३ के बाद)।
  • इनका अरुन्धतीसे अपनी दुर्बलताका कारण बताना (अनु० ९३।६२)।
  • यातुधानोंसे नाम- का निर्वाचन–अर्थ बताना (अनु० ९३।८२)।
  • मृणालकी चोरी नहीं की-इस विषयमें शपथ खाना (अनु० २३।११३)।
  • (२) शुक्राचार्यके पुत्र। भयानक कर्मकर्ता (आदि० ६५।३०)।
  • (३) भगवान् शिवका एक नाम (अनु० १०।३८)।

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