← अनुक्रमणिका

कुबेर

  • पुलस्त्यकुमार विश्वा मुनिके पुत्र, जो राक्षसोंके राजा थे, लङ्कामें निवास करते थे । नरयान (पालकी) पर चढ़नेके कारण 'नरवाहन' तथा राजाओंके भी राजा होनेसे 'राज-राज' कहलाते थे । इनके पिता विश्वा इनपर कुपित थे । पिताके क्रोधको जानकर इन्होंने उनकी सेवा और प्रसन्नताके लिये तीन राक्षस कन्याओंको नियुक्त कर दिया था (आदि० २७५ । १-३) ।
  • इनकी पत्नीका नाम भद्रा है (आदि० १९८ । ६) ।
  • इनका उत्तर दिशामें कैलासपर यक्षों और राक्षसोंके आधिपत्यपर अभिषेक किया गया (वन० १११ । १०-११) ।
  • ब्रह्माजीसे वरदान पाकर रावणका कुबेरको जीतना, इन्हें लङ्कासे निष्कासित करना और इनके पुष्पक विमान-को छीन लेना । फिर कुबेरद्वारा रावणको शाप (वन० २७५ । ३२-३५) ।
  • खाण्डवदाहके समय युद्धमें श्रीकृष्ण और अर्जुनपर प्रहार करनेके लिये इन्होंने गदा हाथमें ली थी (आदि० २२६ । ३२) ।
  • नारदद्वारा इनकी दिव्य सभाका वर्णन (सभा० १० अध्याय) ।
  • इनके द्वारा अर्जुनको अन्तर्धानास्त्रका दान (वन० ४१ । २८) ।
  • इनकी गन्धमादनपर पाण्डवोंसे भेंट और युधिष्ठिर तथा भीमसेनको सान्त्वना (वन० १६१ । ४३-४५) ।
  • इनका अपनेको अगस्त्यसे शाप मिलनेकी कथाका युधिष्ठिरके प्रति वर्णन (वन० १६१ । ५४-६२) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिर और भीमसेनको उपदेश और सान्त्वना (वन० १६२ अध्याय) ।
  • इनका श्रीरामके लिये अभिमन्त्रित जल भेजना (वन० २८१ । ९) ।
  • स्थूणा-कर्णको स्त्री ही बने रहनेका शाप देना (उद्योग० १२२ । ४५-४७) ।
  • यक्षोंके अनुरोधसे उनके शापका अन्त बताना (उद्योग० १२२ । ५०) ।
  • कुबेर शुक्राचार्यसे एक चौथाई धन पाकर उसमें सोलहवाँ भाग मनुष्योंके लिये अर्पित करते हैं (भीष्म० ६ । २३) ।
  • पृथ्वीदोहन-के समय ये दोग्धा थे (द्रोण० ६९ । २४) ।
  • कुबेरकी सरस्वतीके तटपर तपस्या, कुबेरतीर्थकी उत्पत्ति तथा कुबेरको अनेक वरदानोंकी प्राप्ति । कुबेरने वहाँ धनका आधिपत्य, रुद्रदेवके साथ मित्रता, देवत्व, लोकपालत्व, नलकुबेर नामक पुत्र तथा पुष्पकविमान प्राप्त किये (शल्य० ४७ । २८-३१) ।
  • महाराज मुचुकुन्दके साथ युद्ध और वार्तालाप (शान्ति० ७४ । १४-१८) ।
  • उशनाद्वारा अपने धनका अपहरण होनेपर इनकी शिवजी-की शरणमें जाना (शान्ति० २८९ । १२) ।
  • इनके द्वारा अष्टावक्र मुनिका स्वागत-सत्कार (अनु० ११ । ३०-५०) ।

  • The Mahābhārata project aims to provide authentic texts from ancient Mahābhārata Sanskrit texts and commentaries to preserve our heritage for our future generation. We welcome views from all to make the content authentic and error free. Contribution both financial and resources are welcome. For feedback or information please write to us at : secretary@sanatanasampatti.in