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कुरुक्षेत्र

  • सरस्वती एवं दृषद्वती नामक नदीका मध्यवर्ती क्षेत्र । इसमें निवासकी महिमा (वन० ८३ । ४, २०४, २०५) ।
  • कुरुक्षेत्रमें इक्षुमती नदीके तटपर तक्षक रहता था (आदि० १३९ । १३९-१४२) ।
  • कुरुने अपनी तपस्यासे इस क्षेत्रको पवित्र बनाया (आदि० ९४ । ५०) ।
  • गन्धर्वराज चित्ररथके साथ युद्ध करके महाराज चित्राङ्गदकी मृत्यु यहीं हुई थी (आदि० १०१ । ८-९) ।
  • सुन्द और उपसुन्द सम्पूर्ण दिशाओंको जीतकर कुरुक्षेत्रमें निवास करते थे (आदि० २०९ । २०) ।
  • खाण्डवदाहके पहले तक्षक वहाँसे कुरुक्षेत्र चला गया था (आदि० २२६ । ४) ।
  • वनयात्राके समय पाण्डवोंका यहाँ आगमन (वन० ५ । १९) ।
  • यह एक प्रसिद्ध तीर्थ है, जिसके दर्शनमात्रसे पाप नाश हो जाता है (वन० ८३ । १-२, ७-८) ।
  • भीतर एक पवित्र स्थानमें मान्य है (वन० १२६ । ४५) ।
  • मुद्गल नामके एक जितेन्द्रिय ऋषि, जो उञ्छवृत्तिसे जीविका चलाते थे, कुरुक्षेत्रमें ही रहते थे (वन० २६० । ३) ।
  • भीष्म और परशुरामका युद्ध कुरुक्षेत्रमें ही हुआ था (उद्योग० १०८ । ७२) ।
  • कौरव और पाण्डव युद्धके लिये कुरुक्षेत्रमें ही एकत्र हुए और वहीं श्रीकृष्णके मुखसे अर्जुनको गीताका उपदेश प्राप्त हुआ (भीष्म० २५ अध्यायसे ४२ अ० तक) ।
  • महाभारत-युद्धका मैदान कुरुक्षेत्र ही था (भीष्मपर्वसे शल्यपर्वतक) ।
  • इसी क्षेत्रमें भीष्मजी शरशय्यापर पड़े थे (भीष्म० ११६ । १२) ।
  • कुरुक्षेत्रमें सरस्वती नदी 'ओघवती'के रूपमें प्रकट हुई (शल्य० ३८ । ३-४) ।
  • पहले यह समन्तपञ्चक क्षेत्र था । महाराज कुरुके समयसे इसका नाम कुरुक्षेत्र हुआ । इसकी सीमाका निर्धारण तथा महिमा (शल्य० ५३ अ०) ।
  • बलरामजी द्वारा इसकी महिमाका वर्णन (शल्य० ५५ । ६-१०) ।
  • भीमसेन और दुर्योधनका युद्ध तथा दुर्योधनका वध भी इसी क्षेत्रमें हुआ (शल्य० ५५ अ० से ५८ अ० तक) ।
  • अग्निसत्कारपरायण अग्निपुत्र सुदर्शन अपनी पत्नी ओघवतीके साथ कुरुक्षेत्रमें ही रहते थे (अनु० २ । ४०) ।

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