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कुशिक

  • (१) अजमीढके वंशमें उत्पन्न जह्वके वंशज वल्लभे पुत्र (आदि० ९५ । ३३; भीष्म० ९ । ८; अनु० ४ । ५) ।
  • एक स्थानपर इन्हें जह्ववंशज बलाकाका पुत्र कहा गया है (शान्ति० ४९ । ३) ।
  • इनकी पुत्र-प्राप्तिके लिये तपस्या (शान्ति० ४९ । ४) ।
  • इन्द्रका पुत्ररूपमें जन्म (शान्ति० ४९ । ५-६) ।
  • इनके यहाँ च्यवनका आगमन तथा रहनेकी इच्छा बताना (शान्ति० ५२ । ९-१०) ।
  • भार्यासहित इनके द्वारा च्यवनका सत्कार तथा उन्हें सर्वस्व अर्पण (शान्ति० ५२ । १३-१६) ।
  • इनका च्यवनको घरमें ले जाकर ठहराना, शय्या आदि देना और सेवाके लिये प्रतिज्ञा करना (शान्ति० ५२ । २३-२४) ।
  • पत्नीसहित राजाका निराहार रहकर इक्कीस दिनोंतक सोये हुए च्यवनके पैर दबाना (शान्ति० ५२ । ३४-३५) ।
  • च्यवनके सहसा चले जानेसे इनकी चिन्ता और पुनः उन्हें शय्यापर विराजमान देख आश्चर्य और उनकी आज्ञासे पुनः उतने ही दिनोंतक सोये हुए मुनिकी चरणसेवा (शान्ति० ५३ । २-७) ।
  • मुनिके प्रतिकूल आचरणसे भी राजा-रानीका क्रोध न करना (शान्ति० ५३ । ८-१४) ।
  • इन राजदम्पतिका रथमें जुतकर कोड़ोंसे पीटा जाना और अन्तमें मुनिकी कृपासे नवयौवनसम्पन्न एवं स्वस्थ होना (शान्ति० ५३ । १८-२४) ।
  • च्यवन मुनिके वर माँगनेके लिये कहनेपर सन्तोष प्रकट करके नगरको वापस आना (अनु० ५३ । ५१-५५) ।
  • दूसरे दिन मुनिके पास जाकर अद्भुत स्वर्गीय दृश्य देखना (अनु० ५४ । २-२५) ।
  • रानीसे मुनिकी प्रशंसा करना (अनु० ५४ । २६-३१) ।
  • च्यवनके वर माँगनेके लिये कहनेपर सन्तोष प्रकट करना (अनु० ५४ । ३८-४२) ।
  • च्यवन मुनिसे अपने यहाँ रहनेका कारण और परीक्षके क्लेशोंके विषयमें पूछना (अनु० ५५ । १-९) ।
  • च्यवनमुनिसे वर माँगना (अनु० ५५ । ३५) ।
  • अपने पौत्रके ब्राह्मणत्वके विषयमें पूछना (अनु० ५५ । ३६-३७) ।
  • (२) एक वनवासी ऋषि, जो सर्पविषसे मरी हुई प्रमद्वराको देखनेके लिये गये थे (आदि० ८ । २५) ।
  • इन्होंने हस्तिनापुरको जाते हुए श्रीकृष्णकी मार्गमें परिक्रमा की थी (उद्योग० ८३ । २७) ।

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