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कृपाचार्य

  • किसी समय गौतमगोत्रीय शरद्वान्‌का वीर्य सरकंडेके समूहपर गिरा और दो भागोंमें बँट गया, उसीसे एक पुत्र और एक कन्याका जन्म हुआ; कन्याका नाम कृपी हुआ और पुत्र महाबली कृपके नामसे प्रसिद्ध हुआ (आदि० ६३ । १००) ।
  • ये रुद्रगणके अंशावतार और अत्यन्त पुरुषार्थी थे (आदि० ६७ । ७७) ।
  • ‘जानपदी’ नामक अप्सराके दर्शनसे सरकंडेपर स्खलित हुए महर्षि शरद्वान्के दो भागोंमें बँटे हुए वीर्यसे एक पुत्र और एक कन्याकी उत्पत्ति (आदि० १२९ । ६–१४) ।
  • वनमें शिकारके लिये आये हुए महाराज शान्तनुका इन्हें देखना और कृपाके वशीभूत हो घर लाकर इनका पालन-पोषण एवं समस्त संस्कार करना (आदि० १२९ । १५–१८) ।
  • इनका ‘कृप’ नाम होनेका कारण (आदि० १२९ । २०) ।
  • शरद्वान्‌का इनको इनके गोत्र आदिका गुप्तरूपसे परिचय देकर समस्त शास्त्रोंका उपदेश करना (आदि० १२९ । २१–२२) ।
  • ये धनुर्वेदके परमाचार्य हो गये (आदि० १२९ । २२) ।
  • इनसे कौरवों-पाण्डवों तथा यादवोंका धर्मयुद्ध करना (आदि० १२९ । २३) ।
  • रणभूमिमें अर्जुनपर आक्षेप करना (आदि० १२९ । ३२) ।
  • ये युधिष्ठिरके राजसूय यज्ञमें उपस्थित थे (सभा० ३८ । ८) ।
  • धनकी देख-रेख और दक्षिणा बाँटनेके कामपर नियुक्त किये गये थे (सभा० ३५ । ७) ।
  • इनका पाण्डवोंके अन्वेषणके लिये सलाह देना (विराट० २९ । १–१४) ।
  • कर्णको फटकारते हुए युद्धके विषयमें अपना मत प्रकट करना (विराट० ४९ अ०में) ।
  • अर्जुनद्वारा घायल होनेपर कौरवोंका इन्हें अन्यत्र हटा ले जाना (विराट० ५० । ४३) ।
  • दुर्योधनसे दो मासमें पाण्डव-सेनाको नष्ट करनेकी अपनी शक्तिका कथन (विराट० १९३ । १९) ।
  • युधिष्ठिरको आज्ञा देकर अपनेको अवश्य बताना (भीष्म० ४ । २८–४५) ।
  • प्रथम दिनके युद्धमें बृहत्क्षत्रके साथ इनका द्वन्द्वयुद्ध (भीष्म० ४५ । ५२–५४) ।
  • चेकितानद्वारा इनका मूर्च्छित होना (भीष्म० ८४ । ३१) ।
  • सात्यकिको घायल करना (भीष्म० १०१ । ४०–४१) ।
  • सहदेवके साथ द्वन्द्वयुद्ध करना (भीष्म० ११० । १२–१३; भीष्म० १११ । २८–३३) ।
  • भीमसेन और अर्जुनके साथ युद्ध (भीष्म० ११३, ११४ अध्याय) ।
  • धृष्टकेतुके साथ युद्ध (द्रोण० १४ । ३३–३४) ।
  • वार्धक्षेमिके साथ युद्ध (द्रोण० २५ । ५१–५२) ।
  • अभिमन्युके पाश्र्वरक्षकोंका वध कर देना (द्रोण० ४८ । २६) ।
  • इनके ध्वजका वर्णन (द्रोण० १०५ । १४–१६) ।
  • अर्जुनके साथ युद्ध (द्रोण० १४५ अ०) ।
  • अर्जुनके साथ युद्धमें मूर्च्छित होना (द्रोण० १४७ । ९) ।
  • कर्णको फटकारना (द्रोण० १५८ । १३–२३; २३–४०) ।
  • अश्वत्थामासे दुर्योधनको अर्जुनके साथ युद्धके लिये जानेसे रोकनेको कहना (द्रोण० १५९ । ७०–७२) ।
  • इनके द्वारा शिखण्डीकी पराजय (द्रोण० १६१ । ३२) ।
  • द्रोणाचार्यके मारे जानेपर युद्धस्थलसे भागना (द्रोण० १९३ । १२) ।
  • अश्वत्थामासे द्रोणवधका समाचार बताना (द्रोण० १९३ । ३०–६०) ।
  • सात्यकिद्वारा पराजय (द्रोण० २०० । ५३) ।
  • इनके द्वारा शिखण्डीकी पराजय (कर्ण० ५४ । २३) ।
  • चित्रकेतु-पुत्र सुकेतुका वध (कर्ण० ५४ । २८) ।
  • युधामन्युको परास्त करना (कर्ण० ६१ । ५५-५६) ।
  • इनके द्वारा कुलिनद-राजकुमारका वध (कर्ण० ७५ । ६) ।
  • दुर्योधनको सन्धिके लिये समझाना (शल्य० ३० । १-१४) ।
  • दैपायन सरोवरपर जाकर दुर्योधनको युद्धके लिये उत्साहित करना (शल्य० ३० । १९-२४) ।
  • सेनासहित युधिष्ठिरके पहुँचनेपर वहाँसे हट जाना (शल्य० ३० । ६३) ।
  • दुर्योधनके कहनेसे अश्वत्थामाको सेनापति-पदपर अभिषिक्त करना (शल्य० ३५ । ४३) ।
  • देवकी प्रबलता बताते हुए अश्वत्थामाको सन्तुष्ट करनेके लिये राय देना (सौप्तिक० २ अ०) ।
  • अश्वत्थामाको प्रातःकाल युद्ध करनेके लिये समझाना (सौप्तिक० ३ । १९-२०; सौप्तिक० ५ । १-१७) ।
  • अश्वत्थामाके साथ रातमें युद्धके लिये जाना (सौप्तिक० ५ । २८) ।
  • इनके द्वारा पाण्डव-शिविरसे भागे हुए योद्धाओंका वध (सौप्तिक० ८ । १०६-१०७) ।
  • शिविरमें आग लगाना (सौप्तिक० ८ । १०९-११०) ।
  • दुर्योधनकी दशा देखकर विलाप करना (सौप्तिक० ९ । १०-१७) ।
  • धृतराष्ट्र और गान्धारीको कौरव-पाण्डवोंके विनाशकी सूचना देना (स्त्री० ११ । ५-१०) ।
  • समाचार बताकर हस्तिनापुरकी ओर चला जाना (स्त्री० ११ । २१) ।
  • इन्हें द्रोणाचार्यसे खड्ग-विद्या प्राप्त होनेका प्रसंग (शान्ति० १६६ । ८७) ।
  • तपस्यासे सिद्धि या प्रतिष्ठा प्राप्त करने-वाले लोगोंमें इनका भी नाम है (शान्ति० २९६ । १४) ।
  • वनमें जाते समय धृतराष्ट्रका कृपाचार्यको युधिष्ठिरके हाथों सौंपकर अपने साथ लेनेसे लौटाना (आश्रम० १६ । ५) ।
  • महाप्रस्थानसे पूर्व युधिष्ठिरने कृपाचार्यकी पूजा करके उन्हें परीक्षित्को शिष्यरूपमें सौंपा (महाप्रस्थान० १ । १४-१५) ।

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