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कृष्ण

  • (१) सत्यवतीनन्दन द्वैपायन व्यास, जिन्हें शरीरका रंग साँवला होनेके कारण लोग 'कृष्ण' भी कहते थे (आदि० १०४ । ४५) ।
  • (देखिये 'व्यास') ।
  • (२) एक नाग, जो वरुणसभामें रहकर वरुण देवताकी उपासना करते हैं (सभा० ९ । ८) ।
  • (३) अर्जुनका एक नाम (विराट० ४४ । २२) ।
  • (४) स्कन्दका एक सैनिक (शल्य० ४५ । १७) ।
  • (५) एक महर्षि, जो उत्तरायणके आरम्भमें शर-शय्याशायी भीष्मजीको देखनेके लिये पधारे थे (शान्ति० ४७ । १२) ।
  • (६) भगवान् शिवका एक नाम (अनु० १७ । ४५) ।
  • (७) भगवान् विष्णुका एक नाम (अनु० १४९ । ७२) ।
  • (८) ये नारायणस्वरूप हैं; इनकी वन्दना करके महाभारतका पाठ करनेका विधान (आदि० १ । मङ्गलाचरण १) ।
  • (९) 'श्रीकृष्ण' ही धर्मके मूल हैं (आदि० ६३ । ११) ।
  • विश्ववन्दित महायशस्वी भगवान् विष्णु जगत्के जीवोंपर अनुग्रह करनेके लिये वसुदेवजीके द्वारा देवकीके गर्भसे प्रकट हुए (आदि० ६३ । १९) ।
  • आदि-अन्तसे रहित, सबके आत्मा, अव्यय, अनन्त, अचल, अजन्मा, नारायणस्वरूप, अनादि, सर्वव्यापी, परम पुरुष पूर्णतम परमात्मा ही धर्मकी वृद्धिके लिये अन्धक और वृष्णिकुलमें बलराम और श्रीकृष्णरूपसे अवतीर्ण हुए (आदि० ६३ । १००-१०४) ।
  • सम्पूर्ण देवताओं एवं इन्द्रका भगवान् श्रीहरिसे अवतार ग्रहण करनेकी प्रार्थना और भगवान्‌की स्वीकृत (आदि० ६४ । ५-५४) ।
  • देवताओंके भी देवता, सनातन पुरुष, नारायणके ही अंशावतार प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण मनुष्यरूपमें अवतीर्ण हुए थे (आदि० ६७ । ६३) ।
  • अपने श्याम और श्वेत दो प्रकारके केशोंको हरमात्र बनाकर सच्चिदानन्दघन नारायणने स्वयं ही अपनेको पूर्णतम पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण रूपमें प्रकट किया (आदि० १९६ । १३-३३) ।
  • वृष्णिवंशियों- सहित इनका द्रौपदीके स्वयंवरमें आगमन (आदि० १८५ । १६-२०) ।
  • इनका स्वयंवरमें आये हुए ब्राह्मणवेषधारी पाण्डवोंको पहचानना और बलरामजी- को संकेतसे बताना (आदि० १८६ । ८-१०) ।
  • द्रौपदी- स्वयंवरमें भीम और अर्जुनके जिनसे इनका वलरामसे वार्तालाप (आदि० १८८ । २०-२३ के बाद दाक्षिणात्य पाठ) ।
  • पाण्डवोंसे मिलनेके लिये वलरामसहित इनका कुम्भकारकके घरमें आगमन (आदि० १९० । १८) ।
  • द्रौपदीके विवाहके अवसरपर इनके द्वारा पाण्डवोंको विविध उपहारोंकी भेंट (आदि० १९८ । १३-१९) ।
  • पाण्डवोंको द्रुपद-नगरसे हस्तिनापुर जानेके लिये इनकी सम्मति (आदि० २०६ । ६) ।
  • पाण्डवोंके निवासके लिये दिव्य नगर-निर्माणके हेतु इनकी इन्द्रको प्रेरणा (आदि० २०६ । २८ के बाद दाक्षिणात्य पाठ) ।
  • प्रभास क्षेत्रमें इनका अर्जुनके साथ मिलन और रैवतक पर्वतपर विश्राम (आदि० २१० । ३-८) ।
  • अर्जुनको सुभद्राहरणके लिये इनकी सम्मति (आदि० २१८ । २२) ।
  • सुभद्राहरणसे कुपित हुए वृष्णिवंशियोंको इनकी सान्त्वना (आदि० २२० । १-११) ।
  • दहेजस्वरूप विपुल धनराशि लेकर इनका इन्द्रप्रस्थ नगरमें आगमन और भेंटसमर्पण (आदि० २२० । १७-५२) ।
  • अर्जुन- के साथ इनका यमुनाजीमें जल-विहार (आदि० २२१ । १४-२०) ।
  • खाण्डववन-दाहके लिये इनसे अग्निकी प्रार्थना (आदि० २२२ । २-११) ।
  • अग्निद्वारा इनको दिव्य चक्रका दान (आदि० २२४ । २३) ।
  • वरुणद्वारा इनको कौमोदकी गदाकी भेंट (आदि० २२४ । २८) ।
  • खाण्डववनदाहके समय इनका इन्द्र आदि देवताओंके साथ युद्ध (आदि० २२६ अध्याय) ।
  • अर्जुनके द्वारा अभयदान देनेपर इनका मयासुरको जीवनदान (आदि० २२७ । ४४-४५) ।
  • अर्जुनके साथ निरन्तर प्रेम-वृद्धि- के लिये इनकी इन्द्रसे वर-याचना (आदि० २३३ । १३) ।
  • इनकी मयासुरको सभाभवन-निर्माणके लिये आज्ञा (सभा० १० । १३) ।
  • इनकी द्वारकायात्रा (सभा० २ अध्याय) ।
  • इन भगवान् वासुदेवने बिन्दुसरोवरपर धर्मपरम्पराकी रक्षाके लिये बहुत वर्षोंतक निरन्तर श्रद्धा- पूर्वक यश किया था (सभा० ३ । १६) ।
  • युधिष्ठिरको राजसूय यज्ञके लिये इनकी सम्मति (सभा० १४ अध्याय) ।
  • जरासंधके वधके विषयमें इनकी युधिष्ठिर और भीमसेनसे बातचीत (सभा० १५ । १४-२५) ।
  • इनके द्वारा जरासंधकी बातका अनुमोदन और जरासंधकी उत्पत्तिका वर्णन (सभा० १७ अध्याय) ।
  • जरासंध- वधके लिये भीम और अर्जुनके साथ ब्राह्मणरूप धारणकर इनका मगध-यात्रा (सभा० २० अध्याय) ।
  • इनके द्वारा मगधकी राजधानीकी प्रशंसा (सभा० २१ । १-११) ।
  • इनका जरासंधके साथ संवाद (सभा० २१ । ४४-५४) ।
  • निरपराध कैद किये हुए राजाओं- को छोड़ देनेके लिये इनकी जरासंधको चेतावनी (सभा० २२ । १०-२६) ।
  • जरासंधके वधके लिये इनका भीमको संकेत (सभा० २४ । ५ के बाद दाक्षिणात्य पाठ) ।
  • इनके द्वारा जरासंध-पुत्र सहदेवका राज्याभिषेक (सभा० २४ । ४३) ।
  • राजसूय यज्ञके उपलक्ष्यमें इनके द्वारा युधिष्ठिरको विपुल धनराशिकी भेंट (सभा० २३ । १३) ।
  • राजसूय यज्ञमें भीष्मके आदेशपर सहदेवद्वारा इनकी अग्रपूजा (सभा० ३६ । ३०) ।
  • इनके प्रति शिशुपालके आक्षेपपूर्ण वचन (सभा० ३७ अध्याय) ।
  • भीष्मद्वारा इनकी महिमाका वर्णन (सभा० ३८ । ६-२९) ।
  • भगवान् श्रीकृष्णके अवतारका प्रकृतिपर प्रभाव; अवतारकालमें महर्षियों, देवर्षियों आदिका आगमन तथा इन्द्रद्वारा भगवान्‌से प्रार्थना (सभा० ३८ । पृष्ठ ७९७) ।
  • वसुदेवजीका नव- जात शिशु श्रीकृष्णको कंसके भयसे गोकुलमें नन्दगोपके घर छिपा देना (सभा० ३८ । पृष्ठ ७९८) ।
  • इनके पदा- घातसे दही आदिके मटकोंसे भरे छकड़ेका उलट जाना (सभा० ३८ । पृष्ठ ७९८) ।
  • इनके द्वारा पूतनाका वध; यशोदा मैयाका इन्हें ऊखलमें बाँधना । इनके द्वारा यमलार्जुनका उद्धार (सभा० ३८ । पृष्ठ ७९८) ।
  • इनकी सात वर्षकी अवस्थामें वेष- भूषा, खेल-कूद, मनोरंजन और इनके द्वारा वत्स-चारण (सभा० ३८ । पृष्ठ ७९९) ।
  • श्रीकृष्णका अकेले वृन्दावनमें जाना; इनकी शोभा और वन-विहार तथा इनके द्वारा कालिय नामक नागका मर्दन एवं अन्यत्र प्रेषण; इनका बलभद्रजीके साथ वन-विहार (सभा० ३८ । पृष्ठ ८००) ।
  • इनके द्वारा इन्द्रका मान-भङ्ग और गोवर्धन-धारण । देवेन्द्रद्वारा इनका इन्द्रका नामकरण और ‘गोविन्द’ पदपर अभिषेक । इनके द्वारा अरिष्टासुर, केशीनामक दैत्य, आन्ध्रदेशीय मल्ल चाणूर, कंसके सेनापति ‘सुनामा’ का वध; इनके द्वारा कंसके मनमें भयका उत्पादन और कुवलयापीडका वध; श्रीकृष्णद्वारा कंसका वध और उग्रसेनका राजाके पदपर अभिषेक (सभा० २८ । पृष्ठ ८०१; ८०४) ।
  • बलरामजीके साथ इनका मथुरामें ही निवास, उज्जैनमें सान्दीपन मुनिके यहाँ इन दोनों भाइयोंका अध्ययन, चौंसठ कलाओंका अध्ययन एवं गुरुसेवा करना; इन्हें बारह दिनोंमें ही गजशिक्षा और अश्वशिक्षाकी प्राप्ति । सान्दीपनिके यहाँ इनका पुनः धनुर्वेदकी शिक्षाके लिये जाना तथा अवन्तीमें निवास करना; वहाँ ही दस अङ्गोंसे युक्त सुप्रतिष्ठित एवं रहस्यसहित धनुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करना; सान्दीपनिके मरनेवाले असुरका श्रीकृष्ण और बलरामद्वारा वध; मरे हुए गुरुपुत्रको यमलोकसे लाकर इनके द्वारा गुरुदक्षिणा तथा ऐश्वर्यका दान (सभा० २८ । पृष्ठ ८०२) ।
  • श्रीकृष्णको गदा और परिघके युद्धमें तथा सम्पूर्ण अस्त्र-शस्त्रोंके ज्ञानमें उत्कृष्ट स्थानकी प्राप्ति और समस्त लोकोंमें उनकी ख्याति (सभा० ३८ । पृष्ठ ८०३) ।
  • इनका मथुरा छोड़कर द्वारकामें जाना तथा इनके द्वारा बड़े-बड़े असुरोंका वध (सभा० ३८ । पृष्ठ ८०४) ।
  • भौमासुरको मारनेके लिये इनसे इन्द्रकी प्रार्थना (सभा० ३८ । पृष्ठ ८०६)
  • श्रीकृष्णद्वारा नरकासुरको मारकर माता अदितिके कुण्डल ला देनेकी प्रतिज्ञा । इनके द्वारा मुरनामक असुर, निशुम्भ, हयग्रीव, विरूपाक्ष, पञ्चजन तथा नरकासुरका वध (सभा० ३८ । पृष्ठ ८०७) ।
  • भूमिद्वारा इनको कुण्डल-दान (सभा० ३८ । पृष्ठ ८०८) ।
  • मणिपर्वतपर बने हुए नरकासुरके अन्तःपुरमें इनका प्रवेश तथा नरकासुर द्वारा अपहरण करके लायी हुई कन्याओंकी गान्धर्व विवाह करनेके लिये भगवान्‌से प्रार्थना (सभा० ३८ । पृष्ठ ८०८-८१०) ।
  • उनकी प्रार्थना स्वीकार करके श्रीकृष्णका उन्हें द्वारका भेजना (सभा० ३८ । पृष्ठ ८११) ।
  • इनका मणिपर्वतको गरुड़पर लादकर बलरामजी और इन्द्रके साथ स्वर्गलोकमें जाना; मेरु पर्वतके मध्यशिखरपर पहुँचकर श्रीकृष्ण द्वारा देवस्थानोंका दर्शन; फिर देवलोकमें जाकर इन्द्र-भवनके निकट इनका गरुड़से उतरना; देवताओंद्वारा इनका स्वागत तथा इनका माता अदितिके चरणोंमें प्रणाम करके उन्हें कुण्डल अर्पित कर देना (सभा० ३८ । पृष्ठ ८११) ।
  • देवमाता अदिति और इन्द्राणी शचीद्वारा श्रीकृष्ण एवं सत्यभामाका सत्कार तथा वहाँसे लौटकर इन सबका द्वारकामें आगमन (सभा० ३८ । पृष्ठ ८१२) ।
  • इनके द्वारा मणिपर्वत (प्राग्ज्योतिषपुर) से लायी गयी धनराशिंका वृष्णिवंशियोंमें वितरण (सभा० ३८ । पृष्ठ ८१६) ।
  • इन्द्रद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन (सभा० ३८ । पृष्ठ ८१७) ।
  • शोणितपुरमें बाणासुरकी भुजाओंका छेदन और इनका रुक्मीको भयभीत करना; शिशुपालको पराजित करना; शाल्वको भी डराना; इन्द्रद्युम्न, काल्यवन, करोधमान्‌का वध करना । युमत्सेनके साथ इनका युद्ध; महाबली गोपति और तालकेतुका इनके द्वारा वध; पाण्ड्य, पौण्ड्र, मत्स्य, कलिङ्ग और अङ्ग आदि अनेक देशोंके राजाओंकी एक साथ ही पराजय (सभा० ३८ । पृष्ठ ८२४) ।
  • इनके द्वारा बभ्रुकी पत्नीका उद्धार; पीठ, कंस, पैठक तथा अतिलोमा नामक असुरोंका वध; जम्भ, ऐरावत, विरूप और शम्बर आदि असुरोंका वध; भोगवतीमें वासुकि नागको जीतकर इनके द्वारा रोहिणीकुमार गदका उद्धार (सभा० ३८ । पृष्ठ ८२५) ।
  • इनकी गोदमें आते ही शिशुपालकी दो भुजाओं तथा तीसरी आँखका विनाश (सभा० ४३ । १८) ।
  • ‘शिशुपालके सौ अपराध क्षमा कर दूँगा’ ऐसा कहकर इनका श्रुतश्रवा (अपनी बुआ) को आश्वासन (सभा० ४३ । २४) ।
  • इनके द्वारा शिशुपालका वध (सभा० ४५ । २५) ।
  • यज्ञकी समाप्तिपर श्रीकृष्णद्वारा युधिष्ठिरका अभिनन्दन (सभा० ४५ । ३९-४३) ।
  • राजसूय यज्ञमें ऋषियोंसहित श्रीकृष्णके युधिष्ठिरका अभिषेक किया (सभा० ५३ । १५-१६) ।
  • द्रौपदीकी लाज रखनेके लिये इनका अव्यक्तरूपसे उनके चीरमें प्रवेश करके उसे बढ़ाना (सभा० ६८ । ४०) ।
  • इनके द्वारा रोती हुई द्रौपदीको आश्वासनप्रदान (वन० १२ । १२८-१३२) ।
  • इनका जुएके दोष बताते हुए पाण्डवोंपर आयी हुई विपत्तिमें अपनी अनुपस्थितिको कारण मानना (वन० १३ अध्याय) ।
  • इनके द्वारा शाल्वके साथ युद्ध करने तथा सौभ विमानसहित उसके नष्ट करनेका संक्षिप्त वर्णन (वन० १४ अ० से २२ अध्यायतक) ।
  • इनका शाल्वके साथ भीषण युद्ध (वन० २० अध्याय) ।
  • इनका शाल्वकी मायासे मोहित होना (वन० २१ । २२) ।
  • श्रीकृष्णद्वारा सौभविमानसहित शाल्वका वध (वन० २२ । ३१-३७) ।
  • इनका पाण्डवोंसे सम्मानित हो सुभद्रा और अभिमन्युको साथ लेकर द्वारकाको प्रस्थान (वन० २२ । ७७-७८) ।
  • प्रभासक्षेत्रमें पाण्डवोंसे भेंट और सात्यकिके वचनोंका इनके द्वारा समर्थन (वन० २२ । १२३-२६) ।
  • काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास इनका आगमन और इनके द्वारा उन्हें आश्वासन (वन० १६३ । १६-३६) ।
  • मार्कण्डेयजीको कथा कहनेके लिये प्रेरित करना (वन० १६३ । ५०) ।
  • द्रौपदीके स्मरण करनेपर पाण्डवोंके आश्रममें प्रकट होना; बटलोईमें सागका पत्ता खाकर त्रिलोकीको तृप्त करना (वन० २६३ । १८-२५) ।
  • उपप्लव्यनगरमें अभिमन्युके विवाहके अवसरपर जाकर युधिष्ठिरको बहुत-सा धन भेंट करना (विराट० ७२ । २४-२५) ।
  • राजा विराटकी सभा में कौरवोंके अत्याचार और पाण्डवोंके धर्म-व्यवहारका वर्णन करते हुए किसी सुयोग्य दूतको कौरवोंके यहाँ भेजनेका प्रस्ताव (उद्योग० १ अध्याय) ।
  • द्रुपदको कार्यभार सौंपकर इनका द्वारकाको प्रस्थान (उद्योग० ५ । ११) ।
  • दुर्योधन और अर्जुन दोनोंकी सहायता करनेके लिये स्वीकृति देना (उद्योग० ७ । १६) ।
  • अर्जुनका सारथ्य कर्म स्वीकार करना (उद्योग० ७ । ३८) ।
  • संजयको प्रत्युत्तर देते हुए इनके द्वारा कर्मयोगका समर्थन (उद्योग० २१ । ६-१६) ।
  • इनके द्वारा वर्णधर्मका निरूपण (उद्योग० २१ । २२-२६) ।
  • कौरवोंके अन्यायका उद्घाटन करते हुए इनका संजयद्वारा धृतराष्ट्रको चेतावनीका संदेश (उद्योग० २९ । ३१-५८) ।
  • संजयके लिये संदेश देना (उद्योग० ५१ । १९-२९) ।
  • शान्ति-स्थापनाके लिये कौरवसभा में जानेके लिये उद्यत होना (उद्योग० ५२ । ७९-८१) ।
  • कौरवोंके अत्याचारोंका वर्णन करके युधिष्ठिरको युद्धके लिये प्रोत्साहन देना (उद्योग० ७३ अध्याय) ।
  • भीमसेनको उत्तेजित करना (उद्योग० ७५ अध्याय) ।
  • भीमसेनको आश्वासन देना (उद्योग० ७७ अध्याय) ।
  • अर्जुनकी बातोंका उत्तर देना (उद्योग० ७९ अध्याय) ।
  • श्रीकृष्णके द्वारा द्रौपदीको आश्वासन (उद्योग० ८२ । ४४-४९) ।
  • सात्यकिसहित रथपर आरूढ़ हो हस्तिनापुरको प्रस्थान (उद्योग० ८३ । २९) ।
  • मार्गमें इनका दिव्य महर्षियोंके दर्शन करना (उद्योग० ८३ । ६०) ।
  • हस्तिनापुर जाते समय मार्गमें वृक्षस्थलमें विश्राम (उद्योग० ८४ । २०-२१) ।
  • श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें स्वागत (उद्योग० ८९ । ५) ।
  • इनका राज-महलमें प्रवेश (उद्योग० ८९ । ११) ।
  • विदुरके गृहमें पदार्पण (उद्योग० ८९ । २२) ।
  • कुन्तीसे मिलकर उन्हें आश्वासन देना (उद्योग० ९० । १९-२९) ।
  • दुर्योधनसे उसके निमन्त्रणको अस्वीकार करनेका कारण बतलाना (उद्योग० ९१ । २०-२२) ।
  • विदुरके घर इनका भोजन और विश्राम (उद्योग० ९१ । ४१) ।
  • विदुरजीसे कौरवसभा में जानेका औचित्य बतलाना (उद्योग० ९३ अध्याय) ।
  • श्रीकृष्णका कौरवसभा में प्रवेश (उद्योग० ९४ । ३३) ।
  • कौरवसभा में इनका प्रभावशाली भाषण (उद्योग० ९५ अध्याय) ।
  • दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेके लिये समझाना (उद्योग० १२४ । ८-६२) ।
  • दुर्योधनको फटकारना (उद्योग० १२६ । २-३१) ।
  • कंस और दैत्योंका दृष्टान्त देते हुए दुर्योधनको कैद करनेकी सलाह देना (उद्योग० १२६ । ५०) ।
  • दुर्योधनद्वारा कैद किये जानेकी बात सुनकर इनकी सिंहगर्जना (उद्योग० १३० । २४-२९) ।
  • कौरवसभा में इनके विश्वरूपका दर्शन (उद्योग० १३१ । ५-१३) ।
  • इनके द्वारा धृतराष्ट्रको अदृश्य नेत्र प्रदान करना (उद्योग० १३१ । १९) ।
  • कौरवसभा से प्रस्थान (उद्योग० १३१ । ३०-३८) ।
  • कुन्तीके पास जाकर पाण्डवोंसे कहनेके लिये संदेश पूछना (उद्योग० १३२ । ४) ।
  • कर्णके साथ मन्त्रणा तथा उपप्लव्यनगरको प्रस्थान (उद्योग० १३७ । २९-३०) ।
  • कर्णको पाण्डव-पक्षमें आनेके लिये समझाना (उद्योग० १३० । ६-२९) ।
  • कर्णसे पाण्डवोंकी निश्चित विजयका प्रतिपादन करते हुए युद्धकी तिथि निर्धारित करना (उद्योग० १४२ । १७-२०) ।
  • युधिष्ठिरसे भीष्मके वचनोंका वर्णन (उद्योग० १४० । १६-४३) ।
  • युधिष्ठिरसे द्रोणाचार्यके वचनोंका वर्णन (उद्योग० १४८ । २-१६) ।
  • युधिष्ठिरसे विदुरके वचनोंका वर्णन (उद्योग० १४८ । १८-२६) ।
  • युधिष्ठिरसे गान्धारीके वचनोंका वर्णन (उद्योग० १४८ । २९-३६) ।
  • युधिष्ठिरसे धृतराष्ट्रके वचनोंका वर्णन (उद्योग० १४९ अध्याय) ।
  • कौरवसभा में अपने किये हुए प्रयत्नोंका वर्णन करके दण्डपर ही जोर देना (उद्योग० १५० । १८) ।
  • युद्ध-युगको प्रधान सेनापति बनानेका समर्थन (उद्योग० १५१ । ४९) ।
  • युधिष्ठिरको युद्ध करना ही कर्तव्य बतलाना (उद्योग० १५४ । १५) ।
  • दुर्योधनके संदेशका उत्तर देना (उद्योग० १६२ । ६ उद्योग० १६२ । ५०-६३) ।
  • कौरवसेनाको मारनेके लिये अर्जुनको आदेश (भीष्म० २२ । १६) ।
  • अर्जुनको दुर्गाकी स्तुति करनेके लिये कहना (भीष्म० २३ । २) ।
  • अर्जुनको गीताका उपदेश देना (भीष्म० २६ । ११ से ४२ अध्यायतक) ।
  • कुरुक्षेत्रमें इनके द्वारा पाञ्च-जन्य नामक शङ्खका बजाया जाना (भीष्म० २५ । १५) ।
  • सांख्ययोगका वर्णन (भीष्म० २६ । ११-३०) ।
  • अज्ञानी और ज्ञानवान्के लक्षण तथा रागद्वेषसे रहित होकर कर्म करनेके लिये प्रेरणा (भीष्म० २७ । २५-३५) ।
  • फलसहित एवं निष्काम कर्मयोगीके लक्षण तथा ज्ञानयोगकी महिमा (भीष्म० २८ । २४-४२) ।
  • सांख्ययोगी और निष्काम कर्मयोगीके लक्षण तथा ज्ञानयोगकी महिमा (भीष्म० २९ । ७-२६) ।
  • योगभ्रष्ट पुरुषकी गति और ज्ञानयोगकी महिमा (भीष्म० ३० । १७-४०) ।
  • आसुरी स्वभाववालोंकी निन्दा और भगवद्भक्तोंकी प्रशंसा तथा अन्य देवताओंकी उपासनाका वर्णन (भीष्म० ३१ । १३-२३) ।
  • ब्रह्म, अध्यात्म और कर्मादिका वर्णन (भीष्म० ३२ । ३-७) ।
  • सकाम और निष्काम उपासनाका फल और निष्काम भगवद्भक्तिकी महिमा (भीष्म० ३३ । २०-३४) ।
  • श्रीकृष्ण द्वारा अपनी विभूतियों और योगशक्तिका कथन (भीष्म० ३४ । ५-१३) ।
  • इनके द्वारा अनन्यभक्ति तथा फलसहित अनन्यभक्तिका कथन (भीष्म० ३५ । ५-१८; ५५) ।
  • साकार-निराकारके उपासकों और भगवत्प्राप्त पुरुषोंके लक्षणोंका वर्णन (भीष्म० ३६ । १-२०) ।
  • क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुषका वर्णन (भीष्म० ३७ । १-३४) ।
  • सत्, रज और तम तथा भगवत्प्राप्ति के उपाय और गुणातीत पुरुषके लक्षण (भीष्म० ३८ । ५-२७) ।
  • जीवात्माके विषय, प्रभावसहित परमेश्वरके स्वरूप तथा क्षर-अक्षर तथा पुरुषोत्तमका वर्णन (भीष्म० ३९ । (७-२०) ।
  • दैवी और आसुरी सम्पदा तथा आसुरी सम्पदावालोंके लक्षण और उनके अधोगतिका वर्णन (भीष्म० ५० । ७-२०) ।
  • आहार, यज्ञ, तप और दानके पृथक्-पृथक् भेद (भीष्म० ५१ । ७-२२) ।
  • ज्ञान, कर्म, कर्ता, बुद्धि, धृति और सुखके पृथक्-पृथक् भेद (भीष्म० ५२ । १-४०) ।
  • कर्णको पाण्डवोंके पक्षमें आनेके लिये समझाना (भीष्म० ५३ । १-११) ।
  • भीष्मके पराक्रमसे चिन्तित हुए युधिष्ठिरको आश्वासन देना (भीष्म० ५८ । १०-५३) ।
  • चक्र लेकर भीष्मको मारनेके लिये उद्यत होना (भीष्म० ५९ । ८८-८९) ।
  • भीष्मद्वारा इनकी महिमाका वर्णन (भीष्म० ६५ । २५ से ६८ अ० तक) ।
  • भीष्मको मारनेके लिये अर्जुनको चेतावनी (भीष्म० १०६ । ३३-३७) ।
  • चाकू▨क लेकर भीष्मके लिये दौड़ना (भीष्म० १०६ । ५५-५७) ।
  • भीष्मके पराक्रमसे दुःखित युधिष्ठिरको सान्त्वना देना (भीष्म० १०० । २६-४०) ।
  • भीष्मके पास चलनेके लिये युधिष्ठिरके प्रस्तावकी स्वीकृति (भीष्म० १०० । ५२-५५) ।
  • भीष्म-वधके लिये उद्यत न होनेवाले अर्जुनको समझाना (भीष्म० १०० । ९६-१०२) ।
  • भीष्मका वध करनेके लिये अर्जुनको प्रेरित करना (भीष्म० १०८ । ३५-३६) ।
  • भीष्मके मारे जानेपर युधिष्ठिरसे वार्तालाप (भीष्म० १२० । ६६-६७) ।
  • धृतराष्ट्रद्वारा इनकी लीलाओंसहित महिमाका वर्णन (द्रोण० ११ । १-४०) ।
  • भगदत्तद्वारा अर्जुनपर चलाये हुए वैष्णवास्त्रको अपनी छातीपर लेना (द्रोण० २९ । १८) ।
  • अर्जुनके पूछनेपर वैष्णवास्त्रका रहस्य बताकर भगदत्तको मारनेका आदेश देना (द्रोण० २९ । २५-३४; ४४-४५) ।
  • अभिमन्यु-वधसे दुखी होकर विलाप करते हुए अर्जुनको शान्त करना (द्रोण० ७२ । ६६-७४) ।
  • अर्जुनसे जयद्रथकी रक्षाका समाचार बताना (द्रोण० ७५ अ० में) ।
  • पुत्रशोकसे दुखी सुभद्रा और उत्तराको आश्वासन देना (द्रोण० ७८ । ४०-४२) ।
  • अर्जुनकी विजयके लिये समयपर रथ तैयार करके लानेके लिये दारुकको आदेश देना (द्रोण० ८१ । २१-४२) ।
  • सोते हुए अर्जुनको स्वप्नमें दर्शन देना और उनसे वार्तालाप करके शिवजीके पास ले जाना (द्रोण० ८० । २-४९) ।
  • इनके द्वारा भगवान् शिवकी स्तुति (द्रोण० ८० । ५५-६४) ।
  • जयद्रथ-वधके लिये युधिष्ठिरको आश्वासन (द्रोण० ८३ । २१-२८) ।
  • इनके द्वारा शङ्ख बजाया जाना (द्रोण० ८८ । २१) ।
  • द्रोणाचार्यको छोड़कर आगे बढ़नेके लिये अर्जुनको प्रेरणा (द्रोण० ९१ । ३०-३१) ।
  • घोड़ोंको पिलानेके लिये जल प्रकट करनेके हेतु अर्जुनको प्रेरित करना (द्रोण० ९९ । ५८) ।
  • इनके द्वारा संग्रामभूमिमें अश्वपरिचर्या (द्रोण० १०० । १०-१६) ।
  • अर्जुनको दुर्योधनका वध करनेके लिये प्रोत्साहन (द्रोण० १०२ । १-१८) ।
  • दुर्योधनपर बाणोंको विफल होते देख अर्जुनको उपालम्भ (द्रोण० १०३ । ६-१०) ।
  • अर्जुनको सात्यकिके आगमनकी सूचना देना (द्रोण० १४१ । १३-२५) ।
  • भूरिश्रवाके चंगुलसे सात्यकिको छुड़ानेके लिये अर्जुनको प्रेरित करना (द्रोण० १४२ । ६४-६५) ।
  • भूरिश्रवाको मुक्त होनेका वरदान (द्रोण० १४३ । ४८) ।
  • मायाद्वारा अन्धकारकी सृष्टि करके जयद्रथ-वधके लिये अर्जुनको प्रेरित करना (द्रोण० १४३ । ६२-७२) ।
  • जयद्रथके सिरको उसके पिताकी गोदमें डालनेके लिये कहना और उसका रहस्य बताना (द्रोण० १४६ । १०४-११९) ।
  • जयद्रथ-वधके पश्चात् मायारूपी अन्धकारको समेट लेना (द्रोण० १४६ । १२२) ।
  • कर्णके साथ अर्जुनको युद्ध करनेसे मना करना (द्रोण० १४७ । ३३-३६) ।
  • जयद्रथ-वधके बाद अर्जुनको बधाई देना (द्रोण० १४८ । २५-३२) ।
  • अर्जुनको संग्रामका दृश्य दिखाते हुए युधिष्ठिरके पास ले जाना (द्रोण० १४८ । ३६-४०) ।
  • जयद्रथ-वधके बाद युधिष्ठिरको विजयका समाचार बताना (द्रोण० १४९ । २) ।
  • युधिष्ठिरके क्रोधको ही शत्रु-वधमें कारण बताना (द्रोण० १४९ । ४५-५१) ।
  • युधिष्ठिरको द्रोणाचार्यके साथ युद्ध करनेसे रोकना (द्रोण० १५० । ४१) ।
  • आधी रातके समय कर्णके साथ अर्जुनसे युद्धका अनौचित्य बताकर घटोत्कचको भेजनेके लिये अनुमति देना (द्रोण० १५३ । ३५-४१) ।
  • घटोत्कचको कर्णके साथ युद्ध करनेके लिये आदेश देना (द्रोण० १५३ । ४५-५८) ।
  • अर्जुनसे भिन्न-भिन्न महारथियोंका सामना करनेके लिये व्यवस्था बताना (द्रोण० १५५ । ३३-३६) ।
  • आयुधयुका वध करनेके लिये घटोत्कचको प्रेरित करना (द्रोण० १५८ । २-३) ।
  • अर्जुनद्वारा घटोत्कचके वधसे अप्रसन्नताका कारण पूछे जानेपर कर्णकी प्रशंसा करते हुए अपनी प्रसन्नताका कारण बताना (द्रोण० १६० । ३१-३३) ।
  • अर्जुनसे जरासंध आदि धर्मद्रोहियोंके वधका कारण बताना (द्रोण० १६१ । २-३३) ।
  • सात्यकिके कर्णद्वारा अर्जुनपर शक्ति न छोड़े जानेका कारण बताना (द्रोण० १६२ । ३५-४६) ।
  • घटोत्कच-वधसे दुखी युधिष्ठिरको समझाना (द्रोण० १६३ । २४-२६) ।
  • द्रोणाचार्यके वधकी युक्ति बताना (द्रोण० १९० । १०-१२) ।
  • युधिष्ठिरको छलपूर्वक अश्वत्थामाके मारे जानेकी झूठी बात कहनेको विवश करना (द्रोण० ११० । ४६-४७) ।
  • नारायणको शान्त करनेका उपाय बताना (द्रोण० १११ । ४२-४३) ।
  • भीमसेनको रथसे खींचकर नारायणास्त्रको शान्त करना (द्रोण० २०० । १५-१७) ।
  • अर्जुनको युद्धस्थल्का भीषण दृश्य दिखाना (कर्ण० १९ । २८-५३) ।
  • अश्वत्थामाके साथ युद्धमें शिथिल देखकर अर्जुनको चेतावनी देना (कर्ण० ५६ । १३५-१३८) ।
  • अर्जुनको युद्ध-भूमिका दृश्य दिखाते हुए युधिष्ठिरके पास ले जाना (कर्ण० ५८ । १०-४१) ।
  • अर्जुनसे धृष्टद्युम्नको अश्वत्थामाके चंगुलसे छुड़ानेको कहना (कर्ण० ५९ । ४०-४१) ।
  • अर्जुनसे दुर्योधन और कर्णके पराक्रमका वर्णन करके कर्णको मारनेके लिये उन्हें उत्साहित करना और भीमसेनके पराक्रमका वर्णन करना (कर्ण० ६० अध्याय) ।
  • घायल युधिष्ठिरको देखनेके बहाने अर्जुनको कर्णके पाससे हटा लेना (कर्ण० ६४ । ४१) ।
  • अर्जुनके साथ युधिष्ठिरके पास जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम करना (कर्ण० ६५ । १७) ।
  • युधिष्ठिरके वधसे अर्जुनको रोकनेके प्रसंगमें बलाक व्याध और कौशिक ब्राह्मणकी कथा कहकर समझाना और युधिष्ठिरको 'तू' शब्द कहनेमात्रसे अर्जुनकी प्रतिज्ञा-पूर्ति बताना (कर्ण० ६६ अध्याय) ।
  • अर्जुनको आत्मरक्षासे बचाना (कर्ण० ७० । ३३-३४) ।
  • युधिष्ठिरको प्रसन्न करना (कर्ण० ७० । ४९-५१) ।
  • अर्जुनको उपदेश (कर्ण० ७१ । ३-१२) ।
  • कर्णवधके लिये अर्जुनको प्रोत्साहन (कर्ण० ७२ । १० से ७३ अध्याय तक) ।
  • कर्ण-वधके लिये अर्जुनको प्रोत्साहन (कर्ण० ८६ । २-१६) ।
  • कर्णवधके लिये अर्जुनका प्रोत्साहन (कर्ण० ८९ । ४३-४८) ।
  • कर्णके सर्वमुख बाणसे अर्जुनकी रक्षा करना (कर्ण० ९० । २९-३१) ।
  • धर्मकी दुहाई देनेपर कर्णको चेतावनी देना (कर्ण० ९१ । १-१४) ।
  • कर्ण-वधका शुभ समाचार सुनानेके लिये अर्जुनसे युधिष्ठिरके पास चलनेको कहना और सैनिकोंको युद्धकी व्यवस्थाका आदेश देना (कर्ण० ९६ । २-११) ।
  • युधिष्ठिरके पास पहुँचकर कर्ण-वधका समाचार सुनाना (कर्ण० ९६ । १८-२३) ।
  • शल्यका वध करनेके लिये युधिष्ठिरको उत्साहित करना (शल्य० ७ । २५-४१) ।
  • अर्जुनसे दुर्योधनको मारनेके लिये कहना (शल्य० २० । ३-१२) ।
  • युधिष्ठिरको क्रियात्मक प्रयोगद्वारा दुर्योधनको मारनेके लिये सलाह देना (शल्य० ३१ । ६-१५) ।
  • युधिष्ठिरको फटकारना (शल्य० ३३ । २-१६) ।
  • अर्जुनसे भीमसेन और दुर्योधनके बलाबलका वर्णन करके मायाद्वारा दुर्योधनको मारनेकी सलाह देना (शल्य० ५८ । ३-२०) ।
  • दुर्योधनके वधसे कुपित बलरामजीको समझाना (शल्य० ६० । १४-२५ के बादतक) ।
  • भीमसेनद्वारा किये जाते हुए अधर्मपूर्ण बर्तावको आप चुपचाप देखते क्यों हैं ? उन्हें रोकते क्यों नहीं ? यह युधिष्ठिरसे पूछना (शल्य० ६० । ३३-३४) ।
  • इनके द्वारा दुर्योधनपर आक्षेप (शल्य० ६१ । १८-२३) ।
  • दुर्योधनद्वारा किये गये आक्षेपोंका इनकी ओरसे उत्तर (शल्य० ६१ । २७-५०) ।
  • इनके द्वारा पाण्डवोंका समाधान (शल्य० ६१ । ६१-६९) ।
  • इनका अर्जुनको रथसे उतरनेके लिये आदेश देना (शल्य० ६१ । ९०-९१) ।
  • अर्जुनद्वारा रथमें होनेका कारण पूछनेपर इनका उत्तर (शल्य० ६२ । १८-१९) ।
  • इनके द्वारा युधिष्ठिरका अभिनन्दन (शल्य० ६२ । २१-२७) ।
  • युधिष्ठिरके भेजनेसे हस्तिनापुरको जाना (शल्य० ६२ । ७५ शल्य० ६३ । ३४) ।
  • धृतराष्ट्रको आश्वासन देना (शल्य० ६३ । ४०-४८) ।
  • गान्धारीको प्रबोधन (शल्य० ६३ । ५१-६५) ।
  • हस्तिनापुरसे शिविरको लौटना (शल्य० ६३ । ७८) ।
  • अश्वत्थामाकी चपलता और क्रूरताके प्रसंगमें सुदर्शनचक्रके महिमाकी बात सुनाते हुए युधिष्ठिरको उससे भीमसेनकी रक्षा करनेके लिये प्रयत्न करनेका आदेश देना (सौप्तिक० १२ अध्याय) ।
  • अर्जुन और युधिष्ठिरको साथ लेकर अश्वत्थामाकी रक्षाके लिये जाना (सौप्तिक० १३ । १-९) ।
  • अर्जुनको ब्रह्मास्त्र प्रकट करनेका आदेश देना (सौप्तिक० १४ । २-६) ।
  • इनके द्वारा अश्वत्थामाको शाप (सौप्तिक० १६ । ८-१६) ।
  • महादेवीकी महिमाका प्रतिपादन (सौप्तिक० १७ । ६-२६) ।
  • इनका धृतराष्ट्रको समझाना (स्त्री० १२ । २३-३०) ।
  • धृतराष्ट्रको फटकारकर उनका क्रोध शान्त करना (स्त्री० १३ । २-११) ।
  • गान्धारीद्वारा अपनेको दिये गये शापका समर्थन (स्त्री० २५ । ४८-४९) ।
  • गान्धारीको सान्त्वना देना (स्त्री० २६ । १-५) ।
  • नारद-संजय-संवादरूपमें प्रोढराजर्षियोपाख्यान सुनाकर युधिष्ठिर-को समझाना (शान्ति० २९ अध्याय) ।
  • युधिष्ठिरके पूछनेपर नारद-पर्वत-उपाख्यान सुनाना (शान्ति० ३० अध्याय) ।
  • व्यासजीकी बात माननेके लिये युधिष्ठिरको समझाना (शान्ति० ३० । २१-२५) ।
  • युधिष्ठिरसे चार्वाकको प्राप्त हुए वर आदिका वर्णन करना (शान्ति० ३९ अध्याय) ।
  • भीष्मकी प्रशंसा और युधिष्ठिरको उनके पास चलनेका आदेश (शान्ति० ४६ । ११-२३) ।
  • युधिष्ठिरको परशुरामोपाख्यान सुनाना (शान्ति० ४९ अध्याय) ।
  • भीष्मजीके गुण-प्रभावका सविस्तर वर्णन करते हुए उनसे युधिष्ठिरका शोक दूर करनेके लिये कहना (शान्ति० ५० । १३-३८) ।
  • भीष्मकी प्रशंसा करते हुए युधिष्ठिरको धर्मोपदेश करनेका आदेश को वरदान (शान्ति० ५२ । १४-२१) ।
  • इनकी प्रातर्शय्या (शान्ति० ५३ । १-९) ।
  • भीष्मद्वारा ही धर्मोपदेशके लिये भीष्मको वरदान (शान्ति० ५३ । २५-२९) ।
  • भीष्मसे युधिष्ठिरके लज्जित और भयभीत होनेका कारण बताना (शान्ति० ५५ । ११-१३) ।
  • जाति-भाइयोंमें फूट न पड़नेके विषयमें नारदजीसे पूछना (शान्ति० ८१ अध्याय) ।
  • इन्हींसे सम्पूर्ण भूतकी उत्पत्तिका वर्णन करना (शान्ति० २०० अध्याय) ।
  • उपदेशके नारदजीके गुणोंका वर्णन करना (शान्ति० २४० । ४-९) ।
  • अर्जुनको अपने नामोंकी व्युत्पत्ति बताना (शान्ति० ३४१ । ८-५१) ।
  • अर्जुनसे सृष्टिकी प्रारम्भिक अवस्थाका वर्णन करना (शान्ति० ३४२ । ३-२१) ।
  • अर्जुनसे अपने नामोंकी व्याख्या करना (शान्ति० ३४२ । १७-११६) ।
  • युधिष्ठिरसे महादेवजीके माहात्म्यकी कथाके प्रसंगमें उपमन्युकी कथा सुनाना और अपनी तपस्या तथा दर्शन पानेका वृत्तान्त बताना (अनु० १४ अध्याय) ।
  • भगवती उमासे आठ वरदान माँगना (अनु० १५ । ६) ।
  • उपमन्युके साथ शिवजीके विषयमें वार्तालाप (अनु० १६ अध्याय) ।
  • इनके द्वारा भगवान् शिवकी महिमाका वर्णन (अनु० १८ । ६१-८३) ।
  • नारदजीसे पूजनीय पुरुषोंके लक्षण पूछना (अनु० ३१ । २-४) ।
  • पृथ्वीसे गृहस्थोंके पापनाशक अनुष्ठानके विषयमें प्रश्न करना (अनु० ३४ । २१) ।
  • गिरगिटयोनिके नृगका उद्धार करना (अनु० ७० । ७) ।
  • नृगसे उनकी दुर्गतिका कारण पूछना (अनु० ७० । ८-९) ।
  • ब्राह्मणका धन न लेनेके विषयमें घोषणा करना (अनु० ७० । ३१) ।
  • पृथ्वी देवीसे गृहस्थधर्मके विषयमें पूछना (अनु० ९० । ४) ।
  • पर्वतोंको जलाकर पुनः उसे प्रकृतिस्थ करना (अनु० १३१ । १६-२१) ।
  • ऋषियोंके पूछनेपर इसका रहस्य बताना (अनु० १३१ । ३०-४४) ।
  • भीष्मजीद्वारा इनकी महिमाका वर्णन (अनु० १५८ अध्याय) ।
  • युधिष्ठिरको ब्राह्मणकी महिमा सुनानेके प्रसंगमें प्रद्युम्नके पूछनेपर दुर्वासाका चरित्र कहना (अनु० १५९ अध्याय) ।
  • युधिष्ठिरके प्रति शिवजीकी महिमाका वर्णन करना (अनु० १६० अध्याय से १६१ अध्यायतक) ।
  • भीष्मको देह-त्यागके लिये अनुमति प्रदान करना (अनु० १६७ । ४५-४७) ।
  • भीष्मके लिये शोक करती हुई गङ्गाको आश्वासन देना (अनु० १८० । ३०-३५) ।
  • शोकाकुल युधिष्ठिरको समझाना (आश्व० २ । २-८) ।
  • युधिष्ठिरको विविध दृष्टान्तोंद्वारा समझाना (आश्व० ११ अ० से १३ अध्यायतक) ।
  • अर्जुनसे अपने द्वारका जानेका प्रस्ताव करना (आश्व० १५ । १२-१४) ।
  • अर्जुनके पूछनेपर पुनः गीताका ज्ञान सिद्ध महर्षि और काश्यपके संवादरूपसे सुनाना (आश्व० १६ । १ से १८ अध्याय तक) ।
  • पुनः ब्राह्मणगीताके द्वारा ज्ञानोपदेश करना (आश्व० २० अध्यायसे ३४ अध्यायतक) ।
  • अर्जुनके प्रति गुरु-शिष्यके संवादरूपमें ब्रह्मा और महर्षियोंके प्रश्नोत्तररूप मोक्षधर्मका वर्णन (आश्व० ३५ अध्यायसे ५१ अध्यायतक) ।
  • युधिष्ठिरकी आज्ञा पाकर सुभद्रा और सात्यकिके साथ द्वारकाको प्रस्थान (आश्व० ५२ । ५४-५८) ।
  • उत्तङ्क मुनिसे पूछनेपर कौरवों-पाण्डवोंका समाचार सुनाना (आश्व० ५३ । १५-१८) ।
  • उत्तङ्क मुनिसे अध्यात्मतत्त्वका वर्णन करना (आश्व० ५५ । २-५) ।
  • उत्तङ्क मुनिको विश्वरूपका दर्शन कराना (आश्व० ५५ । ४-६) ।
  • उत्तङ्क मुनिको दर्शन देकर चाण्डाल-रूपधारी इन्द्रका रहस्य बताते हुए मरुदेशमें उत्तङ्क नामक मेघोंद्वारा वर्षा होनेका वर देना (आश्व० ५५ । २६-३०) ।
  • रैवतक पर्वतपर होनेवाले महोत्सवमें सम्मिलित होना (आश्व० ५९ । ३-४) ।
  • उस महोत्सवसे अपने महलमें पधारना (आश्व० ५९ । १६) ।
  • वसुदेवजीके पूछनेपर महाभारतयुद्धका वृत्तान्त सुनाना (आश्व० ६० । ६-३६) ।
  • वसुदेवजीके पूछनेपर अभिमन्यु-वधका वृत्तान्त सुनाना (आश्व० ६१ । १५-४२) ।
  • इनके द्वारा अभिमन्युका श्राद्ध-कर्म (आश्व० ६२ । २-५) ।
  • इनका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृतबालकको जिलानेके लिये कुन्तीकी इनसे प्रार्थना (आश्व० ६६ अध्याय) ।
  • उत्तराके मृतबालकको इनके द्वारा जीवनदान (आश्व० ६९ । १६-२४) ।
  • उत्तराके उक्त शिशुका नामकरण (आश्व० ७० । ११-१२) ।
  • श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञके लिये सम्मति देना (आश्व० ७१ । २३-२६) ।
  • श्रीकृष्णका बलराम आदिके साथ आगमन और युधिष्ठिरको अर्जुनका संदेश सुनाना तथा उनके अधिक कष्ट उठानेका कारण बताना (आश्व० ८६ । १३-२१) ।
  • ब्राह्मणोंको दक्षिणा देनेके सम्बन्धमें युधिष्ठिरको व्यासजीकी आज्ञा माननेके लिये कहना (आश्व० ८९ । १८-१९) ।
  • इनका युधिष्ठिरसे विदा लेकर बन्धुओंसहित द्वारकाको लौटना (आश्व० ८९ । ३७-३८) ।
  • भगवान् श्रीकृष्णद्वारा युधिष्ठिरको वैष्णव-धर्म-सम्बन्धी विविध विषयोंका उपदेश (आश्व० ९२ । दक्षिणात्य पाठ, पृष्ठ ६३०८ से ६३५२ तक) ।
  • 'शापकी बात सुनकर भगवान् श्रीकृष्णका वृष्णिवंशियोंकी ऐसी ही भवितव्यता है' ऐसा कहकर नगरमें प्रवेश करना (मौसल० १ । २३-२४) ।
  • मदिरानिर्माण-निषेधकी आज्ञा जारी करना (मौसल० १ । २९-३१) ।
  • द्वारकामें भयंकर उत्पात देखकर भगवान् श्रीकृष्णका यदुवंशियोंको तीर्थयात्राके लिये आज्ञा देना (मौसल० २ अध्याय) ।
  • सात्यकि और प्रद्युम्नको मारा हुआ देख श्रीकृष्णका कुपित हो एक मुट्ठी एरका उठाना और भोज तथा अन्धक कुलके प्रमुख योद्धाओंका संहार करना (मौसल० ३ । ३५-३७) ।
  • साम्ब और गदके मारे जानेपर कुपित हुए श्रीकृष्णद्वारा समस्त यादवोंका संहार (मौसल० ३ । ४४-४७) ।
  • श्रीकृष्णका बलरामजीको एक वृक्षके नीचे ध्यान लगाये बैठे हुए देखना और दारुकको अर्जुनके पास भेजकर संदेश कहना (मौसल० ४ । १-३) ।
  • इनका बलरामजीसे अपनी पत्नियोंके लिये कहकर स्त्रियोंको कुटुम्बी जनोंके संरक्षणमें सौंपनेके लिये द्वारका जाना और पितासे अपनेतक जीवित स्त्रियोंका संरक्षण करनेकी बात कहकर बलरामजीके पास जानेका विचार प्रकट करना (मौसल० ४ । ७-१०) ।
  • उनका रोती हुई स्त्रियोंको आश्वासन दे अर्जुनके आनेकी बात बताकर चल देना और वनके एकान्त प्रदेशमें बलरामजीके पास जाकर उनके मुखसे एक विशाल सर्पको निकलकर समुद्रकी ओर जाते देखना (मौसल० ४ । १२-१३) ।
  • बलरामजीके परमधाम-गमनके पश्चात् उनका उनके बिना चिन्ता बीती जाती और पदमावको याद करके उनपर विचार करना । गांधारी और दुर्वासाके कथनको भी ध्यानमें लाना और परम-धामको जानेके लिये किसी निमित्तकी प्रतीक्षा करते हुए योगयुक्त होकर पृथ्वीपर लेटना, जरानामक व्याधके बाणसे तलुओंमें घाव हो जानेपर अपने तेजसे प्रकाशित होते हुए ऊर्ध्वलोकको जाना, वहाँ उनका स्वागत होना और इन्द्र आदि देवताओंसे मिलना (मौसल० ४ । १८-२६) ।
  • अर्जुनद्वारा इनके शरीरका दाहसंस्कार होना (मौसल० ७ । ३१) ।
  • दिव्यधाममें इनकी नारायणरूपसे स्थिति (स्वर्ग० ५ । २५) ।
  • इनकी पटरानियोंमेंसे सत्यभामा, जाम्बवती, देवकी, देवकीकी अन्य पुत्रियाँ—इन पाँचोंने परलोककी कामनासे अग्निमें प्रवेश किया । सत्यभामा तथा अन्य दो देवियोंने तपस्याका निश्चय करके वनमें प्रवेश किया (मौसल० ७ । ७२-७३) ।
  • शेष सोलह हजार रानियाँ दस्युओंके हाथों लुटकर सरस्वतीके जलमें कूद पड़ीं और स्वर्गमें भगवान्से जा मिलीं (स्वर्ग० ५ । २५) ।
  • (इनकी सभी रानियोंसे दस पुत्र उत्पन्न हुए थे । इनमें प्रद्युम्न, साम्ब, चारुदेष्ण आदि प्रधान हैं ।)

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